Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography - डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी

Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography – डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी

जीवनी

आज हम डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जीवनी यानि Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Biography के बारे में जानेंगे, उसके पहले हम यह जान ले की शिक्षा क्या होती है। शिक्षा, साक्षरता ऐसे शब्द है जिनका जिक्र होते ही व्यक्ति के अंत हृदय में सकारात्मक व नकारात्मक विचारों की कशम-कश आरंभ हो जाती है. क्योंकि आज की वर्तमान समय की शिक्षा को एक व्यापार रूप जो दे दिया गया है। न तो आज का अध्यापक छात्रों के भावनात्मक अर्थात संस्कारों का सर्वांगीण विकास समक्ष नहीं रहा. इसलिए आज की अधिकांश युवा पीढ़ी, अपने कर्तव्य निष्ठा, उत्तरदायित्व, देश प्रेम, देश भक्ति जैसे संस्कार रूपी बीज शून्य मात्र अंकुरित है. जिसके फलस्वरूप आये दिन स्कूल व कॉलेज में देश विरोधी भाषण बाजी आरंभ हो जाती है और उनके समर्थन में राजनैतिक रोटियां बखूबी से सेकी जाती है. जिसके चलते वर्तमान में सम्मान जनक अध्यापन कार्य को एक ग्रहण सा लग चुका है.

आज हम डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में बात करने जा रहे है, जो बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे. उन्होंने अपने जीवन में, शिक्षा व राजनैतिक क्षेत्र को अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया. इसी कारण उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया. इसके अतिरिक्त उन्हें अन्य क्षेत्रों में सराहनीय कार्यों के लिए अनेक पुरस्कार प्रदान किये गये। जिनके उच्च व्यक्तित्व से शिक्षक व छात्र प्रेरित होकर अपने जीवन को एक आदर्श के रूप में स्थापित कर सकेंगे. जिनका जन्म दिन,एक शिक्षक दिवस के रूप में प्रतिवर्ष हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है.

 Dr. Sarvepalli Radhakrishnan का जन्म  5 सितम्बर 1888 को हुआ था वह 1952 से 1962 तक भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति और द्वितीय राष्ट्रपति रहे. वे भारतीय संस्कृति के संवाहक, प्रख्यात शिक्षाविद, महान दार्शनिक और एक आस्थावान हिन्दू विचारक थे. उनके इन्हीं गुणों के कारण सन् 1954 में भारत सरकार ने उन्हें सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से समान्नित किया था. उनके जन्मदिन यानि 5 सितम्बर को भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है. आजाद भारत के पहले उपराष्ट्रपति और दूसरे राष्ट्रपति के तौर पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का नाम भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों से लिखा गया है. वे दर्शनशास्त्र का भी बहुत ज्ञान रखते थे, उन्होंने भारतीय दर्शनशास्त्र में पश्चिमी सोच की शुरुवात की थी. राधाकृष्णन प्रसिध्य शिक्षक भी थे, यही वजह है, उनकी याद में हर वर्ष 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस मनाया जाता है. बीसवीं सदी के विद्वानों में उनका नाम सबसे उपर है. वे पश्चिमी सभ्यता से अलग, हिंदुत्व को देश में फैलाना चाहते थे. राधाकृष्णन जी ने हिंदू धर्म को भारत और पश्चिम दोनों में फ़ैलाने का प्रयास किया, वे दोनों सभ्यता को मिलाना चाहते थे. उनका मानना था कि शिक्षकों का दिमाग देश में सबसे अच्छा होना चाइये, क्यूंकि देश को बनाने में उन्हीं का सबसे बड़ा योगदान होता है.

राधाकृष्णन की जानकारी एक नज़र में

पूरा नाम-डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन
धर्म-हिन्दू
जन्म5 सितम्बर 1888
मृत्यु17 अप्रैल 1975
मातासिताम्मा
पिता-सर्वपल्ली विरास्वामी
जीवनसाथीसिवाकमु (1904)
बच्चे5 बेटी, 1 बेटा
राजनीतिक यात्रा*वर्ष 1931 में, उन्हें बौद्धिक सहयोग के लिए लीग ऑफ नेशन कमेटी में नामांकित किया गया.
*वर्ष 1949 से 1952 तक, वह सोवियत संघ के लिए भारत के राजदूत बने.
*वर्ष 1952 में, उन्हें भारत के पहले उपराष्ट्रपति के रूप में नियुक्त किया गया.
*वर्ष 1962-1967 तक, वह भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने.
राधाकृष्णन की जानकारी एक नज़र में

जन्म और शुरुआती जीवन – Early Life of Dr. Sarvepalli Radhakrishnan

डॉ॰ राधाकृष्णन का जन्म तमिलनाडु के तिरूतनी गांव में हुआ था जो तत्कालीन मद्रास से लगभग 64 कि॰ मी॰ की दूरी पर स्थित है, 5 सितम्बर 1888 को हुआ था. जिस परिवार में उन्होंने जन्म लिया वह एक ब्राह्मण परिवार था. उनका जन्म स्थान भी एक पवित्र तीर्थस्थल के रूप में विख्यात रहा है. राधाकृष्णन के पुरखे पहले कभी ‘सर्वपल्ली‘ नामक ग्राम में रहते थे और 18वीं शताब्दी के मध्य में उन्होंने तिरूतनी ग्राम की ओर निष्क्रमण किया था. लेकिन उनके पुरखे चाहते थे कि उनके नाम के साथ उनके जन्मस्थल के ग्राम का बोध भी सदैव रहना चाहिये. इसी कारण उनके परिजन अपने नाम के पूर्व ‘सर्वपल्ली’ धारण करने लगे थे.

डॉ॰ राधाकृष्णन एक ग़रीब किन्तु विद्वान ब्राह्मण की सन्तान थे. उनके पिता का नाम सर्वपल्ली वीरासमियाह और माता का नाम सीताम्मा था. उनके पिता वीरास्वामी जमींदार की कोर्ट में एक अधीनस्थ राजस्व अधिकारी थे. उन पर बहुत बड़े परिवार के भरण-पोषण का दायित्व था. वीरास्वामी के पाँच पुत्र और एक पुत्री थी. राधाकृष्णन माता पिता के दूसरे नंबर के संतान थे . उनके पिता काफ़ी कठिनाई के साथ परिवार का निर्वहन कर रहे थे. इस कारण राधाकृष्णन को बचपन में कोई खास सुख सुविधा प्राप्त नहीं हो पायी.

राधाकृष्णन का छात्र जीवन – Dr. Sarvepalli Radhakrishnan as Student

 राधाकृष्णन का बचपन  तिरूतनी एवं तिरुपति जैसे धार्मिक स्थलों पर ही व्यतीत हुआ. उन्होंने प्रथम आठ वर्ष तिरूतनी में ही गुजारे. उनके पिता पुराने विचारों के थे और उनमें धार्मिक भावनाएँ भी थीं, इसके बावजूद उन्होंने राधाकृष्णन को क्रिश्चियन मिशनरी संस्था लुथर्न मिशन स्कूल, तिरूपति में 1896-1900 के मध्य पढाई के लिये भेजा। फिर अगले 4 वर्ष तक यानि 1900 से 1904 की उनकी शिक्षा वेल्लूर में हुई। इसके बाद उन्होंने मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास में शिक्षा प्राप्त की। वह बचपन से ही मेधावी थे.

इन 12 वर्षों के अध्ययन काल में राधाकृष्णन ने बाइबिल के महत्त्वपूर्ण अंश भी याद कर लिये. इसके लिये उन्हें विशिष्ट योग्यता का सम्मान प्रदान किया गया. इस उम्र में उन्होंने स्वामी विवेकानन्द और अन्य महान विचारकों का अध्ययन किया. उन्होंने 1902 में मैट्रिक लेवल की परीक्षा उत्तीर्ण की और उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई थी. इसके बाद उन्होंने 1904 में कला संकाय की परीक्षा में पहले श्रेणी में उत्तीर्ण की। उन्हें मनोविज्ञान, इतिहास और गणित विषय में विशेष योग्यता की टिप्पणी भी उच्च प्राप्तांकों के कारण मिली. इसके अलावा क्रिश्चियन कॉलेज, मद्रास ने उन्हें छात्रवृत्ति भी दी. उन्होंने 1909 में उन्होंने कला में स्नातकोत्तर की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली. इनका विषय दर्शन शास्त्र ही रहा. उच्च अध्ययन के दौरान वह अपनी निजी आमदनी के लिये बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का काम भी करते रहे. 1908 में उन्होंने एम० ए० की उपाधि प्राप्त करने के लिये एक शोध लेख भी लिखा। इस समय उनकी आयु मात्र बीस वर्ष की थी. इससे शास्त्रों के प्रति उनकी जिज्ञासा बढ़ी और शीघ्र ही उन्होंने वेदों और उपनिषदों का भी गहन अध्ययन कर लिया. इसके अतिरिक्त उन्होंने हिन्दी और संस्कृत भाषा का भी रुचिपूर्वक अध्ययन किया। दर्शनशास्त्र में एम०ए० करने के पश्चात् 1918 में वे मैसुर महाविद्यालय में दर्शनशास्त्र के सहायक प्राध्यापक में नियुक्त हुए. बाद में उसी कॉलेज में वे प्राध्यापक भी रहे। डॉ॰ राधाकृष्णन ने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराया. सारे विश्व में उनके लेखों की प्रशंसा की गयी.

 राधाकृष्णन का वैवाहिक जीवन – Dr. Sarvepalli Radhakrishnan Married Life

उनके समय में मद्रास के ब्राह्मण परिवारों में कम उम्र में ही शादी हो जाती थी और Dr. Sarvepalli Radhakrishnan के साथ भी ऐसा ही हुआ.1903 में 16 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह दूर के रिश्ते की बहन सिवाकामू के साथ सम्पन्न हो गया। उस समय उनकी पत्नी की आयु मात्र 10 वर्ष की थी. जिसके कारण तीन वर्ष बाद ही उनकी पत्नी ने उनके साथ रहना आरम्भ किया. उनकी पत्नी सिवाकामू ने परम्परागत रूप से शिक्षा प्राप्त नहीं की थी, लेकिन उनका तेलुगु भाषा का अच्छा ज्ञान था.। वह अंग्रेज़ी भाषा भी लिख-पढ़ सकती थीं. 1908 में राधाकृष्णन दम्पति के जीवन में एक पुत्री का जन्म हुआ . उन्हें 5 बेटी व 1 बेटा हुआ. इनके बेटे का नाम सर्वपल्ली गोपाल है, जो भारत के महान इतिहासकारक थे. राधाकृष्णन जी की पत्नी की मौत 1956 में हो गई थी. भारतीय क्रिकेट टीम के महान खिलाड़ी वीवी एस लक्ष्मण इन्हीं के खानदान से ताल्लुक रखते है.

हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन

शिक्षा का प्रभाव जहाँ प्रत्येक व्यक्ति पर निश्चित रूप से पड़ता है, वहीं शैक्षिक संस्थान की गुणवत्ता भी अपना प्रभाव छोड़ती है. क्रिश्चियन संस्थाओं द्वारा उस समय पश्चिमी जीवन मूल्यों को विद्यार्थियों के भीतर काफी गहराई तक स्थापित किया जाता था. यही कारण है कि क्रिश्चियन संस्थाओं में अध्ययन करते हुए राधाकृष्णन के जीवन में उच्च गुण समाहित हो गये। लेकिन उनमें एक अन्य परिवर्तन भी आया जो कि क्रिश्चियन संस्थाओं के कारण ही था। कुछ लोग हिन्दुत्ववादी विचारों को हेय दृष्टि से देखते थे और उनकी आलोचना करते थे. उनकी आलोचना को Dr. Sarvepalli Radhakrishnan ने चुनौती की तरह लिया और हिन्दू शास्त्रों का गहरा अध्ययन करना आरम्भ कर दिया. डॉ॰ राधाकृष्णन यह जानना चाहते थे कि वस्तुतः किस संस्कृति के विचारों में चेतनता है और किस संस्कृति के विचारों में जड़ता है? तब स्वाभाविक अंतर्प्रज्ञा द्वारा इस बात पर दृढ़ता से विश्वास करना आरम्भ कर दिया कि भारत के दूरस्थ स्थानों पर रहने वाले ग़रीब तथा अनपढ़ व्यक्ति भी प्राचीन सत्य को जानते थे. इस कारण राधाकृष्णन ने तुलनात्मक रूप से यह जान लिया कि भारतीय आध्यात्म काफ़ी समृद्ध है और क्रिश्चियन मिशनरियों द्वारा हिन्दुत्व की आलोचनाएँ निराधार हैं. इससे इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि भारतीय संस्कृति धर्म, ज्ञान और सत्य पर आधारित है जो प्राणी को जीवन का सच्चा सन्देश देती है.

डॉक्टर राधाकृष्णन व्यक्तित्व

डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भारतीय संस्कृति के ज्ञानी,एक महान शिक्षाविद,महान दार्शनिक,महान वक्ता होने के साथ ही विज्ञानी हिन्दू विचारक भी थे. राधाकृष्णन ने अपने जीवन के 40 वर्ष एक शिक्षक के रूप में बिताए. डॉ राधाकृष्णन, विवेकानंद और वीर सावरकर को अपना आदर्श मानते थे. इनके बारे में इन्होंने गहन अध्ययन कार रखा था. डॉ राधाकृष्णन अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से समूचे विश्व को भारतीय दर्शन शास्त्र से परिचित कराने का प्रयास किया. Dr. Sarvepalli Radhakrishnan बहुआयामी प्रतिभा के धनी होने के साथ ही देश की संस्कृति को प्यार करने वाले व्यक्ति भी थे.

वह एक आदर्श शिक्षक थे. Dr. Sarvepalli Radhakrishnan के पुत्र डॉक्टर एस.गोपाल ने 1989 में उनकी जीवनी का प्रकाशन भी किया. इसके पूर्व डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन के व्यक्तित्व तथा जीवन की घटनाओं के सम्बन्ध में किसी को भी आधिकारिक जानकारी नहीं थी.

स्वयं उनके पुत्र ने भी माना कि उनके पिता की व्यक्तिगत ज़िदंगी के विषय में लिखना एक बड़ी चुनौती थी और एक नाजुक मामला भी. लेकिन डॉक्टर एस. गोपाल ने 1952 में न्यूयार्क में‘लाइब्रेरी ऑफ़ लिविंग फिलासफर्स’के नाम से एक श्रृंखला पेश की जिसमें सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में आधिकारिक रूप से लिखा गया था. स्वयं राधाकृष्णन ने उसमें दर्ज सामग्री का कभी खंडन नहीं किया.

Dr. Sarvepalli Radhakrishnan का राजनितिक जीवन 

सर्वपल्ली राधाकृष्णन की यह प्रतिभा थी कि स्वतन्त्रता के बाद इन्हें संविधान निर्मात्री सभा का सदस्य बनाया गया। वे 1947 से 1949 तक इसके सदस्य रहे। इसी समय वे कई विश्वविद्यालयों के चेयरमैन भी नियुक्त किये गये। अखिल भारतीय कांग्रेसजन यह चाहते थे कि सर्वपल्ली राधाकृष्णन गैर राजनीतिक व्यक्ति होते हुए भी संविधान सभा के सदस्य बनाये जायें। जब भारत को स्वतंत्रता मिली उस समय जवाहरलाल नेहरू ने राधाकृष्णन से यह आग्रह किया, कि वह विशिष्ट राजदूत के रूप में सोवियत संघ के साथ राजनयिक कार्यों की पूर्ति करें. नेहरूजी की बात को स्वीकारते हुए डॉ.राधाकृष्णन ने 1947 से 1949 तक संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य के रूप में कार्य किया. पंडित नेहरू के इस चयन पर कई व्यक्तियों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि एक दर्शनशास्त्री को राजनयिक सेवाओं के लिए क्यों चुना गया? उन्हें यह सन्देह था कि डॉक्टर राधाकृष्णन की योग्यताएँ सौंपी गई ज़िम्मेदारी के अनुकूल नहीं हैं. लेकिन बाद में सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने यह साबित कर दिया कि मॉस्को में नियुक्त भारतीय राजनयिकों में वे सबसे बेहतर थे. वे एक गैर परम्परावादी राजनयिक थे. जो मन्त्रणाएँ देर रात्रि होती थीं, वे उनमें रात्रि 10 बजे तक ही भाग लेते थे, क्योंकि उसके बाद उनके शयन का समय हो जाता था. जब राधाकृष्णन एक शिक्षक थे, तब भी वे नियमों के दायरों में नहीं बँधे थे. कक्षा में यह 20 मिनट देरी से आते थे और दस मिनट पूर्व ही चले जाते थे. इनका कहना था कि कक्षा में इन्हें जो व्याख्यान देना होता था, वह 20 मिनट के पर्याप्त समय में सम्पन्न हो जाता था. इसके उपरान्त भी यह विद्यार्थियों के प्रिय एवं आदरणीय शिक्षक बने रहे. संसद में सभी लोग उनके कार्य और व्यव्हार की बेहद प्रंशसा करते थे. अपने सफल अकादमिक कैरियर के बाद उन्होंने राजनीतिक में अपना कदम रखा.

Moscow में भारत के राजदूत पद पर रहे

1947 में जब देश आजाद हुआ तब देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने डॉ. राधाकृष्णन से राजदूत के तौर पर सोवियत संघ के साथ राजनीतिक कार्यों पर काम करने का आग्रह किया. उनकी बात को मानते हुए उन्होंने 1947 से 1949 तक वह संविधान सभा के सदस्य को तौर पर काम किए. उसके बाद 1952 तक Dr. Sarvepalli Radhakrishnan रूस की राजधानी मास्को में भारत के राजदूत पद पर रहे.

13 मई 1952 से 13 मई 1962 तक वे देश के उपराष्ट्रपति रहे . 13 मई 1962 को सोवियत संघ से आने के बाद ही वे भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए. राजेंद्र प्रसाद की तुलना में इनका कार्यकाल काफी चुनौतियों भरा था, क्योंकि जहां एक ओर भारत के चीन और पाकिस्तान के साथ युद्ध हुए, जिसमें चीन के साथ भारत को हार का सामना करना पड़ा. वही दूसरी ओर दो प्रधानमंत्रियों का देहांत भी इन्हीं के कार्यकाल के दौरान ही हुआ था. उनके काम को लेकर साथ वालों को, उनसे विवाद कम सम्मान ज्यादा था.

जानेमाने दार्शनिक बर्टेड रशेल ने उनके राष्ट्रपति बनने पर कहा था, ‘भारतीय गणराज्य ने डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन को राष्ट्रपति चुना, यह विश्व के दर्शनशास्त्र का सम्मान है. मैं उनके राष्ट्रपति बनने से बहुत खुश हूं. प्लेटो ने कहा था कि दार्शनिक को राजा और राजा को दार्शनिक होना चाहिए. डॉ. राधाकृष्णन को राष्ट्रपति बनाकर भारतीय गणराज्य ने प्लेटो को सच्ची श्रद्धांजलि दी है.’

संविधान के अंतर्गत उपराष्ट्रपति का नया पद सृजित किया गया था. नेहरू जी ने इस पद हेतु राधाकृष्णन का चयन करके पुनः लोगों को चौंका दिया. उन्हें आश्चर्य था कि इस पद के लिए कांग्रेस पार्टी के किसी राजनीतिज्ञ का चुनाव क्यों नहीं किया गया. उपराष्ट्रपति के रूप में राधाकृष्णन ने राज्यसभा में अध्यक्ष का पदभार भी सम्भाला. सन 1952 में वे भारत के उपराष्ट्रपति बनाये गये. बाद में पण्डित नेहरू का यह चयन भी सार्थक सिद्ध हुआ, क्योंकि उपराष्ट्रपति के रूप में एक गैर राजनीतिज्ञ व्यक्ति ने सभी राजनीतिज्ञों को प्रभावित किया. संसद के सभी सदस्यों ने उन्हें उनके कार्य व्यवहार के लिये काफ़ी सराहा. इनकी सदाशयता, दृढ़ता और विनोदी स्वभाव को लोग आज भी याद करते हैं.

भारत के द्वितीय राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल – Dr. Sarvepalli Radhakrishnan as 2nd President 

सन 1962–1967 तक डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन जी ने भारत के द्वितीय राष्ट्रपति के रूप में कार्यकाल संभाला।

डॉ.राधाकृष्णन को मिले सम्मान व अवार्ड 

शिक्षा और राजनीति में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए डॉ. राधाकृष्णन को सन 1954 में सर्वोच्च सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया.

1962 से राधाकृष्णन जी के सम्मान में उनके जन्म दिवस 5 सितम्बर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की गई .

  • सन् 1931 से 36 तक आन्ध्र विश्वविद्यालय के वाइस चांसलर रहे.
  • ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय में 1936 से 1952 तक प्राध्यापक रहे.
  • कलकत्ता विश्वविद्यालय के अन्तर्गत आने वाले जॉर्ज पंचम कॉलेज के प्रोफेसर के रूप में 1937 से 1941 तक कार्य किया.
  • सन् 1939 से 48 तक काशी हिन्दू विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे.
  • 1946 में युनेस्को में भारतीय प्रतिनिधि के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई.
  • 1953 से 1962 तक दिल्ली विश्‍वविद्यालय के चांसलर रहे.
  • सन 1962 में डॉ. राधाकृष्णन को “ब्रिटिश एकेडमी” का सदस्य बनाया गया.
  •  पोप जॉन पाल ने इनको “गोल्डन स्पर” भेट किया.
  • इंग्लैंड सरकार द्वारा इनको “आर्डर ऑफ़ मेंरिट” का सम्मान प्राप्त हुआ.

डॉ. राधाकृष्णन ने भारतीय दर्शन शास्त्र एवं धर्म के उपर अनेक किताबे लिखी जैसे “गौतम बुद्धा: जीवन और दर्शन” , “धर्म और समाज”, “भारत और विश्व” आदि. वे अक्सर किताबे अंग्रेज़ी में लिखते थे.

1967 के गणतंत्र दिवस पर डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने देश को सम्बोधित करते हुए यह स्पष्ट किया था कि वह अब किसी भी सत्र के लिए राष्ट्रपति नहीं बनना चाहेंगे. बाद में कांग्रेस के नेताओं ने इसके लिए उन्हें कई बार मनाने की भी कोशिश की लेकिन उन्होंने अपनी घोषणा पर अमल किया.

मृत्यु – Death of Dr. Sarvepalli Radhakrishnan 

डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन सामाजिक बुराइयों को हटाने के लिए शिक्षा को ही कारगर मानते थे. शिक्षा को मानव व समाज का सबसे बड़ा आधार मानने वाले डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन का शैक्षिक जगत में अविस्मरणीय व अतुलनीय योगदान रहा है। 17 अप्रैल 1975 को एक लम्बी बीमारी के बाद डॉ राधाकृष्णन का निधन हो गया. शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान हमेंशा याद किया जाता है. इसलिए 5 सितंबर को शिक्षक दिवस मनाकर डॉ.राधाकृष्णन के प्रति सम्मान व्यक्त किया जाता है. इस दिन देश के विख्यात और उत्कृष्ट शिक्षकों को उनके योगदान के लिए पुरुस्कार प्रदान किए जाते हैं. धाकृष्णन के मरणोपरांत उन्हें मार्च 1975 में अमेरिकी सरकार द्वारा टेम्पलटन पुरस्कार से सम्मानित किया गया,जो कि धर्म के क्षेत्र में उत्थान के लिए प्रदान किया जाता है. इस पुरस्कार को ग्रहण करने वाले वह प्रथम गैर-ईसाई सम्प्रदाय के व्यक्ति थे. डॉ राधाकृष्णन ने अपने जीवन के 40 वर्ष एक शिक्षक बन कर रहे. शिक्षा के क्षेत्र में और एक आदर्श शिक्षक के रूप में डॉ राधाकृष्णन को हमेंशा याद किया जाएगा.

सारांश

मुझे आशा है कि आपको मेरा यह लेख “सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन जीवनी ” पसंद आया होगा और आपको यह उपयोगी और प्रेरक लगा होगा. मेरी यही कोशिश है कि मैं अपने रिडर्स को इसके बारे में पूरी जानकारी दूं जिससे सम्बंधित विषय से आपको जानकारी के लिए कहीं और खोजना न पड़े और आपका समय और मेहनत दोनों बचे। यदि आपको यह लेख पसंद आया हो तो इसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मफेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर सकते हैं. 

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