Durga Puja 2020 - दुर्गा पूजा क्या है और इसका इतिहास

Durga Puja 2020 – दुर्गा पूजा क्या है और इसका इतिहास

फेस्टिवल

हर साल दुर्गा पूजा (Durga Puja) की परंपरा रही है. दुर्गा पूजा को दुर्गोत्सव (Durgotsav) भी कहा जाता है. इस उत्सव में माँ भगवती (Ma Bhagwati) की आराधना की जाती है.  देश के अलग-अलग राज्यों में यह पर्व मनाया जाता है. लेकिन पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का आयोजन बड़े स्तर पर होता है. इस अवसर पर बड़े कलात्मक ढंग से सांस्कृतिक (Cultural) और सामाजिक (social) संदेश को जन मानस के सामने प्रस्तुत करने के लिए पंडालों का निर्माण किया जाता है, जो अपने आप में ही अनोखा और अधिक आकर्षक होता है. उसे प्रशासन की ओर से पुरस्कृत किया जाता है. इस अवसर पर विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों और प्रतियोगिताओं का आयोजन कर समाज को सजग और जागरूक बनाया जाता है.  दुर्गा पूजा को मनाये जाने की तिथियाँ पारम्परिक हिन्दू पंचांग के अनुसार निर्धारित होती हैं तथा इस पर्व से सम्बंधित पखवाड़े को देवी पक्षदेवी पखवाड़ा के नाम से जाना जाता है. दुर्गा पूजा के बारे में विस्तार से जानने के लिए यह आर्टिकल पूरा पढ़े…

दुर्गा पूजा क्या है – What is Durga Puja

दुर्गा पूजा के दौरान हिंदू देवी, मां दुर्गा की  पूजा -अर्चना  की जाती है. यह भारत में मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल (West Bengal), असम (Asam), ओडिशा (Odissa), त्रिपुरा (Tripuraa) और बांग्लादेश (Bangladesh) में भी मनाया जाता है. दुर्गा पूजा का आयोजन Hindi Calender के अनुसार आश्विन मास में मनाया जाता है, जो English Calender में September – October के महीनों से मिलता है. यह आमतौर पर महालया (Mahalaya) के  दिन यानी पितर तर्पण के बाद से ही देवी पाठ की शुरुआत हो जाती है. दुर्गा पूजा हिंदू धर्म की अन्य परंपराओं द्वारा मनाए जाने वाले Navaratri और Dussehra उत्सव के साथ मेल खाती है. दुर्गा पूजा के दौरान माँ दुर्गा के साथ-साथ सरस्वती (Saraswwati), लक्ष्मी (Lakshmi), कार्तिक (Kartikey), गणेश (Ganesh) भगवन की भी पूजा की जाती है.

दुर्गा पूजा का इतिहास – History and Origin of Durga Puja

Vedic Civilization mainly पितृ प्रधान सभ्यता थी, बावजूद Vedic period में देवियों का स्थान काफी उच्च स्तर का था. देवी  शब्द का लिखित प्रयोग भी सर्वप्रथम ऋग्वेद (Rigveda) में ही प्राप्त होता है. साथ ही ऋग्वेद- मण्डल दस का “आत्म-सूक्तम” (Atam Suktam) में देवी का काफी विस्तार से वर्णन है. दुर्गा माँ का ममतामयी रूप  वेदों से भी पुराना है. वैदिक मनुष्यों ने भी इसे मान्यता दी है.  देवी-भागवत पुराण (Devi Bhagvat Puran) के अलावा और दो ग्रंथो में शरद दुर्गा पूजन का वर्णन किया गया है, इतना ही नहीं हिंदू धर्म ग्रंथों के अलावा,जैन धर्म (Jain Dharm) में भी इस उत्सव का उल्लेख मिलता है.

पुराने मिले साक्ष्यों और ग्रंथो के अनुसार माँ दुर्गा हिंदू धर्म की प्राचीन देवी हैं. हालांकि, इस महोत्सव की उत्पत्ति के बारे में स्पष्ट रूप से जानकारी नहीं  लेकिन कुछ दस्तावेज़ और पांडुलिपियों (Documents and Manuscripts) जो कि 14th Century के है, इसके अनुसार इतिहास में यह महोत्सव हमेशा समाज के संपन्न वर्गों के द्वारा प्रायोजित किए जाते थे. जबकि ऐतिहासिक रिकॉर्ड (historical record) से पता चलता है कि कम से कम 16th Century के बाद से, मुख्य रूप से Durga Puja को  सार्वजनिक रूप से मानाने के लिए शाही और धनी परिवारों ने प्रयास किया.

सोमदेव (Somdev) द्वारा 11th या 12th Century के जैन पाठ यासतिलक (Jain text Yasatilak) में एक वार्षिक उत्सव का उल्लेख है, जो एक योद्धा देवी को समर्पित है, जिसे राजा और उनके सशस्त्र बलों द्वारा मनाया जाता है. यदि विशेष रूप से भारतीय ग्रंथों की बात करे तो पुराणों के कुछ संस्करण में दुर्गा पूजा एक वसंत त्योहार (Spring festival) है, दूसरी ओर देवी- भागवत पुराण के अनुसार इस महोत्सव को शरदोत्सव (Autumn festival) के रूप में वर्णित किया जाता है.

यह भी मान्यता है कि, भगवान राम ने रावण का वध करने के लिए माँ दुर्गा की आराधना की थी. जिसके बाद माँ दुर्गा नौवें दिन भगवान राम से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया था और भगवान राम ने दशवें दिन रावण का वध कर बुराई पर अच्छाई की जीत को सिद्ध किया था.

दुर्गा पूजा के विभिन्न नाम

दुर्गा पूजा के कई अलग अलग नाम हैं बंगाल, असम, ओडिशा में दुर्गा पूजा को अकालबोधन (“दुर्गा का असामयिक जागरण“), शरदियो पुजो (“शरत्कालीन पूजा“), शरोदोत्सब  बांग्ला: (“पतझड़ का उत्सव“), महा पूजो (“महा पूजा“), मायेर पुजो (“माँ की पूजा“) या केवल पुजो भी कहा जाता है। पूर्वी बंगाल (बांग्लादेश) में, दुर्गा पूजा को भगवती पूजा के रूप में भी मनाया जाता है. दुर्गा पूजा को गुजरात, उत्तर प्रदेश, पंजाब, केरल और महाराष्ट्र में नवरात्रि के नाम से जाना  जाता है. कुल्लू घाटी, हिमाचल प्रदेश में कुल्लू दशहरा, मैसूर, कर्नाटक में मैसूर दशहरा,  तमिलनाडु में बोमाई गोलू और आँध्र प्रदेश में बोमाला कोलुवू के रूप में भी मनाया जाता है.

दुर्गा पूजा क्यों मनाया जाता है

दुर्गा पूजा का त्यौहार मां दुर्गा के द्वारा महिषासुर (Mahishasura) नामक राक्षस के वध की खुशी में मनाया जाता है. दरअसल, हुआ ये था कि राक्षस महिषासुर ने कठिन तपस्या कर देवताओं से अजेय होने का वरदान प्राप्त कर लिया था. अजेय होने का वरदान प्राप्त करते ही महिषासुर खुद को धरती का सबसे शक्तिशाली जीव समझने लगा. वह देवताओं पर आक्रमण करने लगा. उसके उपद्रव से देवतागण भयभीत हो गए, लेकिन अजेय होने के कारण उसे परास्त करना देवताओं के लिए मुश्किल हो गया था.

इसके बाद देवताओं ने महिषासुर वध का खाका तैयार किया. शक्ति की देवी मां दर्गा की अराधना की गई. समस्त देवगण ने अपने-अपने शस्त्र मां दुर्गा को दिए जिससे उन्हें राक्षस महिषासुर का वध करने में मदद मिल सके. सभी देवताओं के शस्त्र पाकर मां दुर्गा अलौकिक रूप से शक्तिशाली हो गईं. इसके बाद Mahishasura और Maa Durga के बीच 9 दिनों तक भीषण युद्ध हुआ. 10 वें दिन Mahishasura का वध कर दिया गया जिसके कारण मां दुर्गा को महिषासुर मर्दिनी नाम मिला.

दुर्गा पूजा का महत्व – Importance of Durga Puja

इस पर्व का बड़ा धार्मिक (Religious) और आध्यात्मिक(Spiritual) महत्व है. Durga Puja  10 दिनों तक चलने वाला Festival  है. Hindu religion  में दुर्गा पूजा का खास महत्‍व होता है क्योंकि इस दिन Maa Durga ने Mahishasura को मार के बुराई पर अच्छाई की जीत को सिद्ध किया और इसी कारण यह त्योहार मनाया जाता है. मान्यता है कि दुर्गा पूजा के समय स्वयं देवी दुर्गा कैलाश पर्वत को छोड़ धरती पर अपने भक्तों के  बीच रहने आती हैं. मां दुर्गा देवी लक्ष्मी, देवी सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश जी के साथ धरती पर अवतरित होती हैं.  

दुर्गा पूजन की विधी- Durga Pooja Vidhi

कहा जाता है की देवी का पूजन बहुत ही सावधानी पूर्वक करना चाहिए, अगर देवी के पूजन मे कोई भी गलती हुई तो देवी तुरंत क्रोधित हो जाती है.  इसीलिए जब भी किसी पंडाल मे देवी विराजमान की जाती है, तो पंडितो के समूह द्वारा देवी के पूजन का पूरा ध्यान रखा जाता है. ब्राह्मणो द्वारा 10 दिनो तक सारे विधिविधान तथा मंत्रोउच्चार बहुत ही सावधानी पूर्वक किए जाते है. जो लोग घरो मे देवी को विराजमान करते है, वह भी पूजा मे काफी सावधानी और विधिवत पूर्वक पूजा करते है.

Rituals and practices

दुर्गा पूजा का त्यौहार दस दिनों का होता है, जिस द्वारान कुछ अनुष्ठान किये जाते हैं. दुर्गा पूजा की शुरुआत महालया से होती है, जिस दिन हिंदू अपने मृत पूर्वजों को जल और भोजन अर्पित कर तर्पण करते हैं. यह दिन कैलाश में अपने पौराणिक वैवाहिक घर से दुर्गा के आगमन का भी प्रतीक है. दुर्गा पूजा का महत्वपूर्ण दिन छठा दिन (षष्ठी) है, उसके बाद सप्तमी,  अष्टमी,  नवमी और दशमी के रूप में मनाया जाता है.

दुर्गा पूजा, हिंदू धर्म की Shaktism tradition के अनुसार मनाये जाने वाला एक Monsoon Festival है.  इस दौरान नौ अलग-अलग पौधों के एक बंडल को शामिल करने की भी प्रथा, जिसे नवपत्रिका (Navapatrika) कहा जाता है, दुर्गा के प्रतीक के रूप में, कृषि (Agriculture) की पूजा का महत्व है. इसमें न केवल अनाज, फल देने वाले पौधें शामिल हैं, बल्कि बिना अनाज देने वाले फसलें भी शामिल हैं. त्यौहार भारत के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों (Northeast states) में एक सामाजिक और सार्वजनिक उत्सव  है, जो की सामुदायिक चौकों, सड़क के किनारे के मंदिरों और पंडाल जैसे जगहों पर मनाया जाता है . इसे कुछ संपन्न लोग घर पर भी मनाते हैं.

Significance of each day in Durga Puja

  • महालया (First Day)

दुर्गा पूजा की शुरुआत महालया से होती है. पहले दिन गणेश की पूजा की जाती है और अपने मृत पूर्वजों को जल और भोजन अर्पित कर तर्पण (Tarpana) की जाती है.

  • द्वितीय (Second Day) से पंचमी (Fifth Day)

द्वितीय से पंचमी तक देवी के सभी रूपों जैसे कुमारी (Goddess of Fertility), माई (Mother), अजीमा (Grandmother), लक्ष्मी (Goddess of wealth) और कुछ क्षेत्रों में सप्तमातृक (Seven Mothers) या नवदुर्गा (Nine Aspects of Durga) की आराधना की जाती है. इस दौरान पूजा अनुष्ठानों में मंत्र (Words that reflect Spiritual change), श्लोक (Holy Verse),आरती, और प्रसाद (Holy offerings) वितरित किया जाता है.

  • षष्ठी (Sashthi)

छठे दिन प्रमुख उत्सव और सामाजिक समारोह शुरू होते हैं. इस दिन बोधन (Bodhana) और अधिवास (Adhivasa) का होता है. जिसमें देवी का एक अतिथि के रूप में स्वागत किया जाता है और कई अनुष्ठान होते हैं जिसमें मां दुर्गा को प्रतीकात्मक प्रसाद चढ़ाया जाता है.

  • सप्तमी (Saptami)

इस दिन नवपत्रिका स्नान (Navapatrika snan) से जाना जाता है. नवपत्रिका को सूर्योदय से पहले गंगा या किसी अन्‍य पवित्र नदी के पानी से स्‍नान कराया जाता है. इस स्‍नान को महास्‍नान (Maha Snan) कहा जाता है.

  • अष्टमी (Ashtami)

इस दिन संध्या पूजा और अष्टमी पुषपंजली  (Sandhi puja and Ashtami pushpanjali) होती है.  आठवें दिन की शुरुआत विस्तृत पुष्पांजली अनुष्ठानों से होती है. आठवें दिन की समाप्ति और नौवें दिन की शुरुआत का समय पुण्यकाल समय माना जाता है. जब शास्त्रों के अनुसार दुर्गा महिषासुर के खिलाफ भीषण युद्ध में लगी थीं और उन पर चंदा और मुंडा नमक राक्षसों (Devil) ने हमला किया था. देवी दुर्गा ने चामुंडा (Chamunda) का रूप धारण कर अपनी तीसरी आंख से उभरीं और अष्टमी के दिन चं (Chanda) और नवमी के  दिन मुंड (Munda) को मार डाला. इस पल को रेतीली पूजा (Retali Puja) से जाना जाता है, जिसमें 108 लोटे चढ़ाने और 108 दीयों को जलाने की परम्परा है. यह 48 minutes का लंबा अनुष्ठान है जो युद्ध के climax को याद करता है. अनुष्ठान अष्टमी के अंतिम 24 मिनट और नवमी के पहले 24 मिनट में किए जाते हैं. कुछ क्षेत्रों में, भक्त एक जानवर जैसे भैंस या बकरी की बलि देते हैं, लेकिन कई क्षेत्रों में, एक वास्तविक पशु बलिदान नहीं होता है. Surrogate पुतले को लाल सिंदूर से रंगा जाता है, जो प्रतिक होता है खून से लिपटे हुए का.

  • नवमीं (Navami)  

दुर्गा पूजा के नौवें दिन को होम अनुष्ठान और भोग (Homa and bhog) के रूप में मनाया जाता है. कुछ स्थान इस दिन कन्या पूजन भी करते हैं.

  • दशमी

दसवें और आखिरी दिन को विजया दशमी कहा जाता है, दशमी या विजयदशमी के दिन होम और भोग (Homa and bhog) होता है. इस दिन को सिंदूर खेला और विसर्जन (Sindoor khela and immersion) के रूप में जाना जाता है. इस दिन महिलाएँ मूर्तियों पर सिंदूर या गुलाल लगाती हैं और साथ में एक-दूसरे के साथ सिन्दूर खेला भी खेलती है . इतना ही नहीं इस दिन धुनुची नाच और धूनी पुरा (Dhunuchi naach and dhuno pora) (अगरबत्ती) का नृत्य अनुष्ठान भी होता है. ढोलकियों को ढाकियां (Dhakiyan) कहा जाता है, चमड़े के बड़े-बड़े ढोल बजते हैं, जिससे संगीत बनता है, जिसमें लोग आरती के दौरान  नाचते हैं.  

देश के विभिन्न क्षेत्र में दुर्गा पूजा का महत्व –Durga Puja Regional Celebrations and Observances 

देश के विभिन्न क्षेत्र में दुर्गा पूजा (Durga Puja) का अपना अलग-अलग महत्व है, महाराष्ट्र (Maharashtra) में, नासिक (Nasik) शहर और अन्य स्थानों जैसे कि राजीवनगर (Rajeevnagar), पंचवटी (Panchwati), और महात्मनगर (Mahatmanagar) में दुर्गा पूजा आयोजन किया जाता है, जबकि दिल्ली को ब्रिटिश भारत की राजधानी(capital) घोषित करने से पहले,  दुर्गा पूजा का आयोजन कश्मीरी गेट (Kashmere Gate) के पास प्रवासी बंगालियों के एक समूह द्वारा 1910 में किया गया था. जिसे अब कश्मीरी गेट दुर्गा पूजा (Kashmere Gate Durga Puja) के नाम से जाना जाता है. तिमारपुर, दिल्ली (Timarpur, Delhi) में दुर्गा पूजा 1914 में शुरू हुई थी. 2011 में, Delhi NCR में गुड़गांव (Gurgaon) और नोएडा (Noida) में कुछ सौ से अधिक दुर्गा पूजा पंडाल आयोजित की गईं थी.

भारत के कुछ हिस्सों में दुर्गा पूजा के दौरान माता काली को पशु बलि भी चढ़ाई जाती है. राजस्थान में रहने वाले राजपूत (Rajput) दुर्गा पूजा के समय अपनी कुल देवी (Kul Devi) को भैंस या बकरे की बलि चढ़ाते है. वहां ये अनुष्ठान ब्राह्मण पंडित के द्वारा करवाया जाता है. देश के अन्य स्थानों में रहने वाले राजपुताना लोग भी ये अनुष्ठान अपने स्थल में करते है. असम (Assam), पश्चिम बंगाल (West Bengal), नेपाल (Nepal) में बकरा या मुर्गे की बलि दी जाती है. 

दुर्गा पूजा ओडियों के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है, इस त्यौहार के 4 दिनों के शुरू होने से पहले, शहर की सड़कें पूरे राज्य में एक Wonderland में बदल जाती हैं, लोग खुद को आनन्दित करके, स्वादिष्ट भोजन खाकर, नए कपड़े पहनकर, अपनी माँ के आगमन का स्वागत करते हैं. 

भारत के बाहर भी मनाया जाता है – Durga Puja Celebrations outside India

दुर्गा पूजा का उत्सव 91% हिन्दू आबादी वाले नेपाल और 8% हिन्दू आबादी वाले बांग्लादेश में भी बड़े त्यौंहार के रूप में मनाया जाता है. वर्तमान में विभिन्न प्रवासी आसामी और बंगाली सांस्कृतिक संगठन, संयुक्त राज्य अमेरीका, कनाडा, यूनाइटेड किंगडम, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैण्ड, सिंगापुर और कुवैत सहित विभिन्न देशों में आयोजित करवाते हैं. वर्ष 2006 में ब्रिटिश संग्रहालय में विश्वाल दुर्गापूजा का उत्सव आयोजित किया गया.

Decoration and Sculpture

दुर्गा पूजा के दौरान जगह- जगह पर पंडाल लगाए जाते हैं और उन्हें तरह तरह की lightings ,flowers की लड़ियों से , मिट्टी के fancy pots , दिये , अल्पना (Alpana) , झालर / पेपर क्राफ्ट आदि के माध्यम से सजाया जाता है. उत्सव के दौरान street lights भी लगाई जाती हैं. रंग-बिरंगी lights का भी प्रयोग किया जाता है.

Durga Puja पंडाल

Durga Puja की शुरुआत से महीनों पहले, समुदाय के युवा सदस्य धन और दान एकत्र करते हैं, जिसमें पुजारियों और कारीगरों (Priests and Artists) को शामिल करते हैं,  पूजा से जुड़ी सामग्री खरीदते हैं और एक theme base पंडाल बनाने में मदद करते हैं, जो वर्तमान समय में काफी प्रचलित हो रहा है, जिसमें भव्य महल (Grand Palace), आध्यात्मिकता (Spirituality), स्वस्थ सम्बंधित (Health), महिला सशक्तिकरण (Women Empowerment), मानवता (Humanity) सम्बंधित समस्या, लाइफस्टाइल (lifestyle), पर्यावरण सम्बंधित (Environment related), स्पोर्ट्स (Sports), ऐतिहासिक धरोहर (Historic Monuments), समाजिक मुद्दे (Social Issues), हाल के मुद्दे (Recent Issues and Topics) जैसे विषय चुने जाते हैं. थीम आधारित पंडालों में प्रतियोगिता भी होती है, इसमें विजेता भी चुना जाता है, जिसके बाद जीतने वाले पंडाल को सरकार द्वारा पुरस्करित किया जाता है. 

दुर्गा माँ की मूर्ति कैसे बनती है – Clay

माता की मूर्ति के निर्माण में 10 जगहों की मिट्टी (soil) का प्रयोग किया जाता है. इन दसों जगह की मिट्टी का प्रयोग करने के पीछे धार्मिक और पौराणिक कारण है. इसकी एक वजह सामजिक भी मानी जाती है. दरअसल “देवी भाग्वत् पुराण ” में बताया गया है कि सभी देवों और प्रकृति के अंश से मां दुर्गा का तेज प्रकट हुआ था. इसलिए मूर्ति के निर्माण में दस स्थानों की मिट्टी मिलाने की पौराणिक परंपरा रही है. इसके पीछे एक तर्क यह भी है कि मां दुर्गा की पूजा में सभी की समान भागीदारी के लिए वेश्यालय के आंगन की मिट्टी,  पहाड़ की चोटी, नदी के दोनों किनारों, बैल के सींगों, हाथी के दांत, सुअर की ऐड़ी, दीमक के ढेर, किसी महल के मुख्य द्वार, किसी चौराहे और किसी बलि भूमि की मिट्टी लाई जाती है. मिट्टी का आधार पुआल (Straw) के साथ संयुक्त है, गूंध (Knead), और फिर घास (Grass) और बांस (bamboo) से बने कलाकारों में ढाला जाता है. यह एक ठीक अंतिम आकार के लिए स्तरित, साफ, चित्रित (paited), और पॉलिश (polish) किया जाता है. मिट्टी के साथ मिश्रित जूट (Joot) नामक एक fiber की एक परत भी ऊपर से लगाई जाती है ताकि प्रतिमा को लम्बे समय तक टूटने से बचाया जा सके. मूर्तियों के सिर अधिक जटिल हैं, और आमतौर पर अलग-अलग बनाए जाते हैं. इन सबके बाद August में, स्थानीय कारीगरों के जरिये मूर्तियों को हाथ से paint किया जाता है और उनके कपड़े पहनाये और सजाये जाते है, पूजा की जाती है, और अंत में  पूजा वेदियों पर प्रदर्शित किया जाता है.

Environmental impact

पूजा के लिए मूर्तिकला की मूर्तियाँ पारंपरिक रूप से पुआल (Straw), मिट्टी (Soil) और लकड़ी (Wood) जैसे Biodegradable सामग्रियों से बनी होती हैं. आज के समय में, चमकीले रंग की मूर्तियों की लोकप्रियता में काफी वृद्धि हुई है, और Non – Biodegradable, सस्ती या अधिक रंगीन Substitute Synthetic raw material के उपयोग को विविधता प्रदान की है. Environment पर काम करने वाले scientist ने इन प्रतिमाओं को निर्माण करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली पेंट पर चिंता जताई है, जिसमें कहा गया है कि दुर्गा उत्सव के अंत में मूर्तियों को विसर्जित करने पर ये पेंट नदियों  को  काफी  polluted करते हैं. Biodegradable चमकीले रंग पर्यावरण को काफी प्रभावित करते हैं. भारतीय राज्य पश्चिम बंगाल ने खतरनाक पेंट के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगा दिया गया है, और विभिन्न राज्य सरकार ने प्रदूषण को रोकने के लिए कारीगरों को lead-free paint इस्तेमाल करने को बोलै गया है.

दुर्गा पूजा पर्व तिथि व मुहूर्त 2020

Day and DateTime
षष्ठीकल्परम्भ(21 अक्टूबर 2020) – बुधवारषष्ठी आरम्भ09:09:26
षष्ठी समाप्त07:41:23
सप्तमी – नवपत्रिका पूजन (22 अक्टूबर 2020) – गुरुवार सप्तमी आरम्भ07:41:23



सप्तमी समाप्त06:58:53
अष्टमी – दुर्गा महा अष्टमी पूजा (23 अक्टूबर 2020)शुक्रवार अष्टमी आरम्भ06:58:53
अष्टमी समाप्त07:01:02
नवमी – दुर्गा महा नवमी पूजा (24 अक्टूबर 2020)शनिवार नवमी आरम्भ07:01:02
नवमी समाप्त07:44:04
दशमी- दशहरा – 25 अक्टूबर 2020रविवार विजय मुहूर्त13:57:06 से 14:41:57 तक
अवधि0 घंटे 44 मिनट अपराह्न
दुर्गा विसर्जन (26 अक्टूबर 2020)सोमवार दुर्गा विसर्जन समय06:29:16 से 08:43:31 तक
अवधि2 घंटे 14 मिनट
दुर्गा पूजा पर्व तिथि व मुहूर्त 2020

अगले पांच सालों के लिए Durga Puja की तारीख पता करें

2021सोमवार , 11 अक्टूबर – शुक्रवार, 15 अक्टूबर
2022 शनिवार, 1 अक्टूबर – बुधववार, 5 अक्टूबर
2023 शुक्रवार, 20 अक्टूबर – मंगलवार, 24 अक्टूबर
2024 बुधववार, 9 अक्टूबर – रविवार, 13 अक्टूबर
2025 रविवार, 28 September – गुरुवार, 2 अक्टूबर
Durga Puja की तारीख पता करें

Conclusion

 मुझे आशा है कि आपको मेरा यह लेख “Durga Puja 2020 – दुर्गा पूजा क्या है और इसका इतिहास” पसंद आया होगा और आपको यह उपयोगी लगा होगा. यदि आपको यह लेख पसंद आया हो तो इसे आप अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर सकते हैं. और हाँ अगर कोई टॉपिक छूट गया हो या फिर आपका कोई सुझाव हो तो आप कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं. हम उस पर अमल करने की पूरी कोशिश करेंगे.

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