गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है - Why Celebrate Ganesh Chaturthi

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है – Why Celebrate Ganesh Chaturthi

फेस्टिवल

गणेश चतुर्थी (Ganesh Chaturthi) का त्योहार बस आने ही वाला है. इसकी तैयारियां भी की जा रही है. यह भादो मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को मनाई जाती है. इस बार 22 अगस्त शनिवार को गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी.

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लोकमान्यता के अनुसार वैसे तो बप्पा को घर में 10 दिन रखने की परंपरा है, लेकिन लोग इन्हें अपनी इच्छानुसार घर में रखते हैं. कोई बप्पा को एक दिन के लिए लाता है तो कोई तीन दिन के लिए. क्योंकि हिंदू धर्म में कोई भी पूजा, हवन या मांगलिक कार्य भगवान गणेश की स्तुति के बिना अधूरा है. इसी के चलते गणेश चतुर्थी यानि कि भगवान गणेश के जन्मदिवस को पूरे देश में उत्तसाहपूर्वक मनाया जाता है. चलिए आपको बताते हैं इसे मनाने की असली वजह-

गणेश चतुर्थी क्या है – What is Ganeshh Chaturthhi

Ganesh Chaturthi, एक पवित्र हिंदू त्योहार है, लोगों द्वारा भगवान गणेश के जन्म दिन के रूप में मनाया जाता है. पूरा हिंदू समुदाय एक साथ पूरी श्रद्धा और समर्पण के साथ हर साल ये त्योहार मनाया जाता है.  कहा जाता है कि गणेश जी का जन्म माघ में चतुर्थी को हुआ था. तब से, भगवान गणेश के जन्म की तारीख गणेश चतुर्थी के रूप में मनानी शुरू की गई. आज कल ये त्योहार भारत में ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में मनाया जाता है.

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है – Why Ganesh Chaturthi is Celebrated

भादो मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी को Ganesh Chaturthi मनाई जाती है. अब आपके मन में अगर ये सवाल उठ रहा है कि आखिर गणेश चतुर्थी का त्योहार क्यों मनाया जाता है? क्या है इसका कारण. तो चलिए आज हम आपको बताते हैं. गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है कारण…

माना जाता है कि भादो मास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी की प्रथमपूज्य भगवान गणेश का जन्म हुआ था. पुराणों और हिंदू धर्म शास्त्रों के मुताबिक भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को भगवान श्री गणेश का जन्म हुआ था. इसके उपलक्ष्य में इस त्योहार को बड़ी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है. ज्यादातर महाराष्ट्र और उसके आस-पास के क्षेत्रों में गणेश चतुर्थी के बाद 10 दिन तक गणेशोत्सव मनाया जाता है. इस दौरान श्रद्धालु अपने घर में भगवान श्री गणेश की प्रतिमा स्थापित करते हैं और पूरे दस दिन गणेश भगवान की पूजा करते हैं. गणेशोत्सव के आखिरी दिन यानि अनंत चतुर्दशी के दिन गणपति जी का विसर्जन किया जाता है. कहा जाता भगवान गणेश की पूजा करने से घर में सुख, समृद्धि और संपन्नता आती है. कई लोग इस दिन व्रत भी रखते हैं, कहा जाता है कि व्रत रखने से भगवान गणेश खुश होते हैं और अपने भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करते हैं. ऐसे में भक्त बड़ी ही श्रद्धाभाव से गणेश जी की पूजा-अर्चना करते हैं.

गणेश चतुर्थी का महत्व – Importance of Ganesh Chaturthi

Ganesh Chaturthi का त्योहार भाद्रपद मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के दिन मनाया जाता है. यह दिन गणेश जी के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है, माना जाता है कि इसी दिन भगवान गणेश की उत्पत्ति हुई थी.गणेश जी को सभी देवताओं में प्रथम पूजनीय माना गया है.इस दिन गणपति बप्पा को अपने घर में लाकर विराजमान करने से वो अपने भक्तों के सारे विघ्र, बाधाएं दूर करते हैं. इसलिए गणेश जी को विघ्रहर्ता भी कहा जाता है. गणेश चतुर्थी को लोग गणेश जी को अपने घर लाते हैं, गणेश चतुर्थी के ग्वारहवें दिन धूमधाम के साथ उन्हें विसर्जित कर दिया जाता है.

गणेश चतुर्थी  कैसे मनाया जाता है – How is Ganesh Chaturthi Celebrated

Ganesh Chaturthi जिसे कि विनायक चतुर्थी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू धर्म  में एक बहुत ही शुभ पर्व माना जाता है. यह पर्व हिंदी कैलेन्डर के भाद्रपद मास में मनाया जाता है. विशेषकर पश्चिम भारत के महाराष्ट्र राज्य में गणेश चतुर्थी को बहुत ही भव्यता एंव आस्था के साथ मनाया जाता है. क्योंकि गणेश जी का एक नाम विघ्रहरता भी है इसलिए हिन्दुओं का मानना है कि इस दस दिनों के दौरान, जो कि बहुत ही शुभ माने जाते हैं, कहा जाता है कि अगर विधि-विधान के साथ गणेश जी का पूजन किया जाता है कि जीवन में सौभाग्य, समृद्धि और सुखों की वर्षा करते हैं.

दस दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के लिए गणेश जी की प्रतिमा को घरों, मंदिर और पन्डालों में साज-श्रंगार के साथ शुद्ध चतुर्थी वाले दिन स्थापित किया जाता है. इसके बाद पुजारी मूर्ति में वैदिक मन्तोच्चारण के साथ प्राम फूंकता है जिसे कि प्राणप्रतिष्ठा कहा  जाता है. दस दिन तक अर्थात अनंत-चतुर्दशी तक गणेश प्रतिमा का नित्य विधिपूर्वक पूजन किया जाता है, ग्वारहवें दिन इस प्रतिमा को किसी स्वच्छ जलाशय जैसे कि नदी अथवा सागर आदि में प्रवाहित कर दिया जाता है

महाराष्ट्र में इस दिन विशेष आयोजन होता है. भक्त लोग इस दिन गणेश-प्रतिमा को हाथों, रथों व वाहनों पर उठा कर बहुत धूमधाम से गाजों बाजों के साथ इसे प्रवाहित करने के लिए पैदल ही जलाशयों की ओर चल पड़ते हैं और ऊंची आवाज में नारे लगाते हैं. गणपति बप्पा मोरया , मंगल मूर्ति मोरया, पर्चा वर्षा लौकरिया‘. जिसका अर्थ होता है कि ओ परमपिता गणेश जी! मंगल करने वाले, अगले बरस जल्दी आना.

गणेश चतुर्थी का इतिहास Ganesh Chaturthi History

गणेश चतुर्थी एक बड़ी तैयारी के साथ एक वार्षिक घरेलू त्योहार के रूप में हिंदू लोगों द्वारा मनाना शुरू किया गया था. यह ब्राह्मणों और गैर ब्राह्मणों के बीच संघर्ष को हटाने के साथ ही लोगों के बीच एकता लाने के लिए एक राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाना शुरू किया गया था. महाराष्ट्र में लोगों ने ब्रिटिश शासन के दौरान बहुत साहस और राष्ट्रवादी उत्साह के साथ अंग्रेजों के क्रूर व्यवहार से मुक्त होने के लिए मनाना शुरू किया था. गणेश विसर्जन की रस्म लोकमान्य तिलक द्वारा स्थापित की गई थी.

धीरे-धीरे लोगों द्वारा यह त्योहार परिवार के समारोह के बजाय समुदाय की भागीदारी के माध्यम से मनाना शुरू किया गया. समाज और समुदाय के लोग इस त्यौहार को एक साथ सामुदायिक त्योहार के रुप में मनाने के लिए और बौद्धिक भाषण, कविता, नृत्य, भक्ति गीत, नाटक, संगीत समारोहों, लोक नृत्य करना, आदि क्रियाओं को सामूहिक रूप से करते हैं. लोग तारीख से पहले एक साथ मिलते हैं और उत्सव मनाने के साथ ही साथ यह भी तय करते हैं कि इतनी बड़ी भीड़ को कैसे नियंत्रित करना है.

गणेश चतुर्थी की कथा – Story of Ganesh Chaturthi

हिंदू धर्म के धार्मिक ग्रथों में गणपति के जन्म को लेकर अलग अलग पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं जिनमें से एक के मुताबिक माता पार्वती ने खुद के शरीर को हल्दी का लेप लगाया गया था. जब उन्होंने अपना लेप हटाया तो उन टुकड़ों से उन्होंने एक मूर्ति बनाई. इसके बाद उन्होंने उसमें प्राण डाल दिए. इस तरह से भगवान गणेश का जन्म हुआ. इसके बाद वो भगवान शिव और माता पार्वती के बेटे कहनाए जाने लगे.इसके अलावा भी उनके जन्म को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं.

गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के मुताबिक एक बार भगवान शिव माता पार्वती के साथ नर्मदा नदी के पास बैठे और उनके मन में चौपड खेलने का विचार आया. लेकिेन इस खेल में हार जीत का फैसला कौन करेगा. इस सवाल के बाद भगवान शिव ने कुछ तिनके इकट्ठा करके एक पुतला बनाया. उस पुतले की प्राण प्रतिष्ठ कर दी और पुतले से कहा कि बेटा हम चौपड खेलना चाहते हैं और हमारी हार जीत का फैसला करने वाला कोई नहीं है. इसलिए तुम बताना कौन हारा कौन जीता. खेल शुरू हुऐ और तीन बार खेला गया व तीनों बार माता पार्वती को जीत हासिल हुई. जब खेल खत्म हुआ तो बालक से हार जीत का फैसला करने के लिए कहा गया.

इसके बाद बालक ने महादेव को विजेता बताया, तो ये बात सुनकर पार्वती क्रोधित हो गई. इसके बाद माता पार्वती ने बालक को लंगडा होने और किचड़ में पड़े रहने का श्राप दे दिया.

बालक ने माता से क्षमा प्रार्थना की और कहा कि उससे ये अज्ञानता वश हुआ है. तब माता ने कहा कि यहां गणेश पूजन के लिए नाग कन्याएं आएंगी, उनके कहे मुताबिक तुम गणेश व्रत करो, ऐसा करने से तुम मुझे प्राप्त करोगे, यह कहकर माता, भगवान शिव के साथ कैलाश पर्वत पर चली गई.

बहुत समय बाद वहां नाग कन्याएं आईं और उनके साथ उस बालक ने भी Ganesh Chaturthi व्रत का पालन पूरे 21 दिनों तक लगाताक किया. उसकी इस भावना को देखकर गणपति खुश हुए और उसे वरदान मांगने को कहा. तभी उस बालक ने मांगा कि मुझे इतनी शक्ति दो कि मैं अपने पैरों से चलकर अपने माता-पिता के पास कैलाश पहुंच सकुं. भगवान उसे ये वरदान देकर अंतर्ध्यान हो गए.

दिव्य बालक ने ये कथा कैलाश पहुंचकर महादेव को सुनाई लेकिन बालक को महादेव के पास देखकर पार्वती मां नाराज हो गई. तभी जिस तरह इस बालक ने 21 दिनों तक गणेश चतुर्थी का पालन किया ठीक वैसे ही भगवान शिव ने भी इस व्रत का पालन किया. जिसके बाद माता पार्वती का गुस्सा अपने आप ठीक हो गया और वो भगवान से मिलने कैलाश पर वापिस आ गई.

इसके बाद माता पार्वती ने शिव से पूछा कि आपने ऐसा कौन सा उपाय किया जिससे मैं आपसे मिलने के लिए व्याकुल हो गई. शिव ने Ganesh Chaturthi व्रत की विधि माता पार्वती को भी बताई और माता ने भी कार्तिकेय से मिलने के लिए इस व्रत का पालन किया और 21 वे दिन भगवान कार्तिकेय खुद माता से मिलने उनके पास आ गए. उसके बाद कार्तिकेय ने यही व्रत विश्वामित्रजी को बताया.

विश्वामित्रजी ने इस व्रत को करके गणेश जी से जन्म से मुक्त होकर ब्रह्म-ऋषि होने का वर मांगा. गणेश जी ने उनकी मनोकामना पूर्ण की और इसलिए श्री गणेश जी चतुर्थी व्रत को मनोकामना व्रत भी कहा जाता है.

Ganesh Chaturthi व्रत कथा

एक बार महादेवजी स्नान करने के लिए भोगवती गए. उनके जाने के पश्चात पार्वती ने अपने तन के मैल से एक पुतला बनाया और उसका नाम ‘गणेश’ रखा. पार्वती ने उससे कहा- हे पुत्र! तुम एक मुगदल लेकर द्वार पर बैठ जाओ. मैं भीतर जाकर स्नान कर रही हूं. जब तक मैं स्नान न कर लूं. तब तक तुम किसी भी पुरुष को भीतर मत आने देना.

भोगावती में स्नान करने के बाद शिवजी आए तब गणेश जी ने उन्हें द्वार पर रोक लिया. शिव जी को ये अपमान लगा और उन्होंने गुस्से में आकर उनका सिर धड़ से अलग कर दिया और वो अंदर चले गए. पार्वती ने शिव जी को गुस्से में देखकर सोचा कि वो भोजन में विलंब होने के कारण महादेव नाराज हैं. इसलिए उन्होंने तत्काल दो थालियों में भोजन परोसकर शिवजी को बुलाया.

दूसरा थाल देखकर शिव जी ने पार्वती माता से पूछा कि ये दूसरा थाल किसका है. तब पार्वती माता ने कहा कि ये थाल गणेश का है जो बाहर पहरा दे रहे हैं. ये सुनकर भगवान शिव आश्चर्यचकित हुए. तुम्हारा पुत्र पहरा दे रहा है? हां नाथ! क्या आपने उसे देखा नहीं? देखा तो था, किन्तु मैंने तो अपने रोके जाने पर उसे कोई शैतान बालक समझकर उसका सिर काट दिया. यह सुनकर माता पार्वती दुखी हुईं. वो विलाप करने लगीं. तब पार्वती माता दुखी हुईं. वो विलाप करने लगीं. तब माता पार्वती को खुश करने के लिए भगवान शिव ने एक हाथी के बच्चे का सिर काटकर बालक के धड़ से जोड़ दिया. पार्वती जी इस प्रकार पुत्र गणेश जी को पाकर खुश हुईं. उन्होंने पति और पुत्र को प्रीतिपूर्वक भोजन कराकर बाद में स्वयं भोजन किया.

Sankashti Ganesh Chaturthi – संकष्टी गणेश चतुर्थी व्रत कथा

संकष्टी Ganesh Chaturthi व्रत प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को किया जाता है. इस व्रत को धर्मराज युधिष्ठिर ने किया था. पूर्वकाल में राजच्युत होकर अपने भाइयों के साथ जब धर्मराज वन में चले गए थे, तो उस वनवास काल में भगवान श्रीकृष्ण ने उनसे कहा था. युधिष्ठिर ने भगवान कृष्ण से अपने कष्टों के शर्मनार्थ जो प्रसन्न किया था, उस कथा को आप श्रवण कीजिए.

युधिष्ठिर पूछते हैं कि, हे पुरुषोत्तम! ऐसा कौन सा उपाय हैं जिससे हम वर्तमान संकटों से मुक्त हो सके. हे गदाधर आप सर्वज्ञ हैं. हम लोगों को आगे अब किसी प्रकार का कष्ट न भुगतना पड़े, ऐसा उपाय बतलाइए.

स्कंदकुमार जी कहते हैं कि जब धैर्यवान युधिष्ठिर विनम्र भाव से हाथ जोड़कर, बारम्बार अपने कष्ठों के निवारण का उपाय पूछने लगे तो श्री कृष्ण ने कहा कि हे राजन. संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला एक बहुत बड़ा गुप्त व्रत हैं. हे युधुष्ठिर ! इस व्रत के संबंध में मैंने आज तक किसी को नहीं बतलाया हैं.

हे राजन! प्राचीनकाल में सतयुग की बात हैं कि पर्वतराज हिमाचल की सुंदर कन्या पार्वती ने शंकर जी को पति रूप में प्राप्त करने के लिए गहन वन में जाकर कठोर तपस्या की. लेकिन शिव भगवान प्रसन्न होकर प्रकट नहीं हुए तब शैलतनया पार्वती जी ने अनादि काल से विधमान गणेश जी का स्मरण किया.

गणेश जी को उसी क्षण प्रकट देखकर पार्वती जी ने पूछा कि मैंने कठोर, दुर्लभ एंव लोमहर्षक तपस्या की, किन्तु अपने प्रिय भगवान शिव को प्राप्त न कर सकी. वह कष्टविनाशक दिव्य व्रत जिसे नारद जी ने कहा है और जो आपका ही व्रत हैं, उस प्राचीन व्रत के तत्व को आप मुझसे कहिए. पार्वती जी की बात सुनकर तत्कालीन सिद्धि दाता गणेश जी उस कष्टनाशक, शुभदायक व्रत का प्रेम से वर्णन करने लगे.

गणेश जी ने कहा- हे अचलसुते! अत्यंत पुण्यकारी एवं समस्त कष्टनाशक व्रत कीजिए. इसके करने से आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होगी. श्रावण के कृष्ण चतुर्थी की रात्रि में चंद्रोदय होने पर पूजन करना चाहिए. उस दिन मन में संकल्प करें कि जब तक चंद्रोदय नहीं होगा, मैं निराहार रहूंगी. पहले गणेश पूजन कर ही भोजन करूंगी. मन में ऐसा निश्चय करना चाहिए. इसके बाद सफेद तिल के जल से स्नान करें. मेरा पूजन करें. तथा अपनी सामर्थ्य के मुताबिक सोने, चांदी, तांबे अथवा मिट्टी के कलश में जल भरकर उस पर गणेश जी की प्रतिमा स्थापित करें.

Bhadrapada Ganesh Chaturthi Katha in Hindi – भाद्रपद गणेश चतुर्थी व्रत कथा

पूर्वकाल में राजों में श्रेष्ठ राजा नन था उसकी रूपवती रानी का नाम दमयन्ती था. शाव वश राजा नल रो राज्यच्युक्त होना पड़ा और रानी के वियोग से कष्ट सहना पड़ा. तब दमयन्ती ने इस व्रत के प्रभाव से अपने पति को प्राप्त किया. राजा नल के ऊपर विपत्तियों का पहाड़ टूट पड़ा था. डाकूओं ने उनके महल से धन, गजशाला से हाथी और घुड़शाला से घोड़े हरण कर लिये, तथा महल को अग्रि से जला दिया. राजा नल भी जुआ खेलकर सब हार गये.

नल असहाय होकर रानी के साथ वन को चले गए. शाप वश स्त्री से भी वियोग हो गया कहीं राजा और कहीं रानी दुखी होकर देशाटन करने लगे. एक समय वन में दमयन्ती को महर्षि शरभंग के दर्शन हुए. दमयन्ती ने मुनि को हाथ जोड़कर नमस्कार किया और प्रार्थना कि प्रभु! मैं अपने पति से किस प्रकार मिलूंगी? शरभंग मुनि बोले- दमयन्ती ! भादों की चौथ को एकदन्त गजानन की पूजा करनी चाहिए. तुम भक्ति और श्रद्धापूर्वक गणेश चौथ का व्रत करो तुम्हारे स्वामि तुम्हें मिल जाएंगे.

शरभंग मुनि के कहने पर दमयन्ती ने भादों की गणेश चौथ को व्रत शुरू किया और सात महीने में ही अपने बेटे और पति को प्राप्त किया. इस व्रत के प्रभाव से नल ने सभी सुख प्राप्त किये. विघ्र का नाश करने वाला और सुख की प्राप्ति करने वाला ये सर्वोतम व्रत है.

Vaishakh Ganesh Chaturthi Katha in Hindi – वैशाख गणेश चतुर्थी व्रत कथा

पुराने वक्त की बात है, एक रतिदेव नाम के राजा हुआ करते थे और उनके राज्य में धर्मकेतु नाम का ब्राह्नाण रहता था. धर्मकेतु की दो पत्नियां थी, एक का नाम सुशीला तो दूसरी का नाम चंचलता था. दोनों ही पत्नियों के व्यवहार और विचारों में बहुत अंतर था. सुशीला धार्मिक प्रवृत्ति की थी और व्रत-उपवास और पूजा अर्चना आदि में अत्यधिक विश्वास रखती थी. इसके विपरीत चंचलता भोग विलास में ज्यादा मस्त रहती थी. वह शारीरिक सुंदरता और साज-श्रंगार पर ज्यादा ध्यान लगाती थी. व्रत-उपवास और पूजा अर्चना से उसका कोई सरोकार ना था.

कुछ समय बाद धर्मकेतु की दोनों ही पत्नियों को संतान की प्राप्ति हुई. सुशीला ने एक बेटी को जन्म दिया तो चंचलता को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. इसके बाद चंचलता ने सुशीला से कहना शुरू किया कि सुशीला! तूने इतने व्रत किए और अपना शरीर तक सुखा लिया फिर भी तुझे लड़की हुई. मैंने कोई व्रत-उपवास नहीं रखा और ना ही पूजा अर्चना की, फिर भी मुझे लड़का हुआ.

कुछ समय तक तो सुशीला सुनती रही लेकिन जब उसके लिए सुनना असहनीय हो गया तो उसने गणेश जी की पूजा आरंभ की. गणेश जी प्रसन्न हुए तब उनकी कृपा से सुशीला की पुत्री के मुंह से बहुमूल्य मोती-मूंगे निकलने लगे. उसने एक रुपवान पुत्र को जन्म दिया. सुशीला का बदला भाग्य देखकर चंचलता को ईर्ष्या होने लगी और उसने सुशीला की बेटी को कुएं में गिरा दिया, लेकिन सुशीला पर तो गणेश जी की कृपा थी इसलिए उसकी बेटी का बाल भी बांका नहीं हुआ. इसी तरह से वैशाख महीने की कथा यही संपन्न होती है.

Ganesh Chaturthi का शुभमुहूर्त और पंचांग कब है-

 हिंदी पंचांग के मुताबिक, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी या विनायक चतुर्थी होता है. इस साल 22 अगस्त को गणेश चतुर्थी है. मान्यताओं के मुताबिक विघ्नहर्ता श्री गणेश जी का जन्म भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन ही हुआ था, इसलिए इस दिन गणेश चतुर्थी या विनायक चतुर्थी मनाई जाती है.

पूजा का मुहूर्त

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरुआत 21 अगस्त दिन शुक्रवार की रात 11 बजकर 2 मिनट से हो रहा है, जो 22 अगस्त दिन शनिवार को शाम 7 बजकर 57 मिनट तक रहेगी. गणेश चतुर्थी की पूजा हमेशा दोपहर के मुहूर्त में की जाती है. कहा जाता है कि ऐसा इसलिए क्योंकि गणेश जी का जन्म दोपहर में हुआ था.

Ganesh Chaturthi 2020

साल 2020 में गणेश चतुर्थी 22 अगस्त से लेकर 1 सितंबर तक अनंत चतुर्दशी के दिन तक चलेगा. अनंत चतुर्दशी को गणेश प्रतिमा के विसर्जन के साथ गणेशोत्सव संपन्न होता है. गणेश चतुर्थी के दिन व्रती को चंद्र दर्शन नहीं करना चाहिए. इससे चंद्र दोष लग सकता है. जिसमें व्यक्ति को मिथ्यारोपों का सामना करना पड़ सकता है.

गणेश विसर्जन कब है

10 दिनों तक गणपति की आराधना करने के पश्चात 1 सितंबर दिन मंगलवार को सहर्ष गणपति बप्पा को बहते जल में विसर्जित कर दें.

अगले पांच सालों के लिए गणेश चतुर्थी की तारीख पता करें

202022 अगस्त (शनिवार)
202111 सितम्बर (शनिवार)
202231 अगस्त (बुधवार)
202319 सितंबर (मंगलवार)
20247 सिंतबर (शनिवार)
अगले पांच सालों के लिए गणेश चतुर्थी की तारीख

सारांश

मैं आशा करती हूं गणेश चतुर्थी का आपको मेरा ये लेख ‘पसंद आया होगा. मेरी यही कोशिश है कि मैं रिडर्स को इसके बारे में पूरी जानकारी दूं. जिससे आपको इससे जुड़ी अन्य जानकारी के लिए इंटरनेट पर कहीं और खोजने की जरूरत ना पड़े. अगर आपको ये आर्टिकल पसंद आया हो तो आप इसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर कर सकते हैं.

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