Mahatma Gandhi Biography in Hindi - महात्मा गाँधी की जीवनी

Mahatma Gandhi Biography in Hindi – महात्मा गाँधी की जीवनी

जीवनी

आज हम महात्मा गाँधी की जीवनी यानि Mahatma Gandhi Biography के बारे में जानेंगे। मोहनदास करमचंद गाँधी (2 अक्टूबर 1869 – 30 जनवरी 1948) (Mohandas Karamchand Gandhi) एक औपनिवेशिक विरोधी राष्ट्रवादी (anti-colonial nationalist) और राजनीतिक नैतिकतावादी (political ethicist) थे। पेशे से वकील, गाँधी ने अहिंसक प्रतिरोध (nonviolent resistance) के सिद्धांत को अपनाकर भारतीय स्वतंत्रता (Indian independence) आंदोलन को सफल बनाया। उन्होंने न सिर्फ भारत को colonial rule यानि British rule से आजादी दिलायी बल्कि विश्व में चल रहे Civil Rights और Independence movements को भी प्रेरित किया। मोहनदास करमचंद गाँधी को लोग महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) और राष्ट्रपिता या बापू (Father of the Nation) कहकर भी पुकारते हैं।

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महात्मा गाँधी की जीवनी एक नजर में

पूरा नाम:मोहनदास करमचंद गाँधी
जन्म:2 अक्टूबर 1869 (Porbandar, Kathiawar, British Presidency, British India)
मृत्यु:30 जनवरी 1948 (78 वर्ष), नयी दिल्ली
पिता:करमचंद गाँधी
माता:पुतलीबाई गाँधी
जीवनसाथी:कस्तूरबा गाँधी (1883-1944)
बच्चे:हरिलाल, मणिलाल, रामदास, देवदास
पेशा:वकालत, राजनीतिक, सामाजिक कार्यकर्ता, लेखक
राजनीतिक पार्टी:कांग्रेस
पद:कांग्रेस अध्यक्ष (1924-1925)
साहित्यिक कार्य:The Story of My Experiments with Truth (Gujrati: सत्य न प्रयोग अथवा आत्मकथा)
गतिविधि के वर्ष:1893-1948
महात्मा गाँधी की जीवनी एक नजर में

प्रारंभिक जीवन और पारिवारिक पृष्ठभूमि – Early life and family background of Mahatma Gandhi

मोहनदास करमचंद गाँधी (Mohandas Karamchand Gandhi) का जन्म 2 अक्टूबर 1869 को गुजरात (Gujarat) के काठियावाड़ (Kathiawar) में एक गुजराती मोध (Modh) बनिया परिवार में हुआ था। उनकी माता का नाम पुतलीबाई गाँधी (Putlibai Gandhi) था और उनके पिता करमचंद उत्तमचंद गाँधी (Karamchand Uttamchand Gandhi) उस समय के पोरबंदर की रियासत (princely state of Porbandar) के दीवान (diwan) हुआ करते थे। गौरतलब है कि काठियावाड़ उस समय पोरबंदर रियासत का हिस्सा था।

महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) अपने पिता कि चौथी संतान थे। उनसे पहले उनके पिता के तीन संतानें और थीं जिनमें एक मोहनदास करमचंद गाँधी कि बहन भी थी। सबसे पहले थे लक्ष्मीदास, उसके बाद थी रलियत बहन, उसके बाद करसनदास और फिर थे मोहनदास करमचंद गाँधी। मोहनदास करमचंद गाँधी के बारे में उनकी बहन कहती हैं कि वो बचपन में बहुत अशांत रहा करते थे। वे आगे कहती हैं कि मोहनदास करमचंद गाँधी या तो खेल कूद में लगे रहते थे या फिर आवारागर्दी करते रहते थे। किन्तु श्रवण कुमार (Shravana)और राजा हरीशचंद्र (Harishchandra) की कहानियों ने उनके बचपन में बहुत गहरी छाप छोड़ी।

अपने माता पिता में से मोहनदास करमचंद गाँधी (Mohandas Karamchand Gandhi) अपनी माता से बहुत अधिक प्रभावित थे। उनकी माता का सम्बन्ध मध्यकालीन कृष्ण भक्ति प्रेरित प्रणामी परंपरा (Krishna bhakti-based Pranami tradition) से था। वो सदैव पूजा करने के बाद ही भोजन ग्रहण करती थीं और उपवास भी रखती थीं। उनकी माता कठिन उपवास रखा करतीं थीं और अपना व्रत पूरा किया करतीं थीं।

प्रारम्भिक शिक्षा – Mahatma Gandhi Education

महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) जब 9 वर्ष के थे तब उनके पिता ने उनका दाखिला राजकोट (Rajkot) के एक स्कूल में करवाया था। उनके पिता उस समय राजकोट के दीवान (diwan) हुआ करते थे। 11 वर्ष की आयु में बापू ने राजकोट के ही एक High School में दाखिला ले लिया। उस समय वो एक औसत छात्र हुआ करते थे। उन्होंने कुछ इनाम भी जीते थे लेकिन वे शर्मीले स्वाभाव के बहुत कम बोलने वाले छात्रों में से थे। इसके अलावा उनकी खेलों में भी कोई विशेष रूचि नहीं थी। स्कूल में किताबें ही उनकी एकमात्र मित्र थीं।

विवाह – Mahatma Gandhi Marriage

महात्मा गाँधी (Mahatama Gandhi) अभी पढ ही रहे थे कि उनके परिवार ने मई  1883 में  उनका विवाह 14 वर्षीया कस्तूरबा माखनजी कपाडिया (Kasturbai Makhanji Kapadia) से कर दिया। बापू उस समय केवल 13 वर्ष के थे। इसी बीच उनका एक वर्ष निकल गया और उनकी पड़े अधूरी रह गयी। उनकी शादी एक पारिवारिक समारोह में हुई थी और उस समय उन्हें केवल इतना पता था कि शादी में नए कपडे पहनने को मिलेंगे और स्वादिष्ट मिठाइयां खाने को मिलेंगी। विवाह के पूरे एक साल बाद गाँधी जी को फिर से पड़ने का मौका मिला।

पिता और पुत्र का देहांत

1885 में महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) के पिता जी का स्वर्गवास हो गया। बापू उस समय केवल 16 वर्ष के थे और कस्तूरबा 17 वर्ष की। उसी समय उनके पहले बच्चे का जन्म हुआ किन्तु कुछ दिन बाद वो भी चल बसा। पिता और पुत्र की एक साथ मृत्यु ने महात्मा गाँधी को भीतर तक तोड़ दिया था। कुछ समय बाद कस्तूरबा ने चार और बच्चों को जन्म दिया – हरिलाल (1888); मणिलाल (1892); रामदास (1897) और देवदास (1900)।

Graduation and London Staying

नवंबर 1887 में 18 वर्ष की आयु में महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) ने अहमदाबाद (Ahmedabad) के एक हाई स्कूल से Graduation की degree हासिल की उसके बाद उन्होंने जनवरी 1888 में भावनगर राज्य (Bhavnagar State) के समलदास कॉलेज (Samaldas College) में दाखिला लिया। लेकिन उन्हें पढ़ाई बीच ही में छोड़कर पोरबंदर लौटना पड़ा। Mahatma Gandhi एक बहुत ही साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे और ऐसे में उनके लिए सबसे सस्ते कॉलेज की फीस भरना भी मुश्किल था। किन्तु उन्होंने अपने पारिवारिक ब्राह्मण और मित्र मावजी दवे जोशीजी की सलाह मानकर London जाकर Law पड़ने का फैसला लिया।

इसी बीच उनके पहले पुत्र हरिलाल का जन्म हुआ। ऐसे समय में महात्मा गाँधी जी की माताजी को उनका अपने परिवार को छोड़कर लंदन जाने का विचार पसंद नहीं आया। किन्तु महात्मा गाँधी ने कसम खायी कि वे अपने लंदन प्रवास के दौरान कोई भी गलत काम जैसे कि मदिरापान, तामसिक भोजन और विषयागमन नहीं करेंगे। इससे खुश होकर उनकी माता पुतलीबाई ने उन्हें आशीर्वाद देकर लंदन प्रवास की इजाजत दे दी।

10 अगस्त 1888 को महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) ने लंदन (London) के सफर की शुरुआत की। उस समय बापू केवल 18 वर्ष की थे। किन्तु इस सफर में अभी काफी मुश्किलें आनी थीं। महात्माम गाँधी पोरबंदर से मुंबई (Mumbai) की लिए रवाना हुए जहां से उन्हें लंदन की लिए जहाज पकड़ना था। मुंबई में वे अपने बिरादरी की लोंगो की घर ठहरे जहां उन्हें लंदन ना जाने की सलाह दी गयी और न माने पर समाज से बहिष्कृत (excommunicate) करने की धमकी दी किन्तु महात्मा गाँधी ने उनकी सलाह को न मानकर लंदन जाने का फैसला किया।

4 सितम्बर को महात्मा गाँधी लंदन की लिए निकल पड़े। वहाँ उन्होंने University College, London में दाखिला लिया और कानून और विधिशास्त्र (law and jurisprudence) की पढ़ाई की। जल्द ही उन्हें बैरिस्टर (barrister) बनाने की मकसद से इनर टेम्पल (Inner Temple) बुलाया गया। लेकिन गाँधी जी का शर्मीलापन लंदन में भी गया नहीं। इससे उबरने की लिए उन्हें पब्लिक स्पीकिंग प्रैक्टिस ग्रुप (public speaking practice group) की आवश्यकता पड़ी।

शाकाहार और समिति का काम – Vegetarianism and committee work

लंदन में अपनी माता जी को दिए गए वचन को निभाने के लिए गाँधी जी ने शाकाहारी भोजन लेना शुरू कर दिया लेकिन साथ साथ वो अंग्रेज़ों के तौर तरीके (English customs) भी सीखते रहे। उन्होंने उनके रिवाज सीखे और नाचना भी सीख लिया। किन्तु वहाँ मिलने वाले शाकाहारी भोजन से वो खुश नहीं थे। उन्होंने एक अच्छे शाकाहारी भोजनालय की तलाश की। हेनरी साल्ट (Henry Salt) की किताबों से प्रेरित होकर उन्होंने लंदन वेजीटेरियन सोसाइटी (London Vegetarian Society) की सदस्यता स्वीकार कर ली और जल्द ही उसकी कार्यकारी समिति में चुन लिए गए। वहाँ उनकी मुलाकात थियोसोफिकल सोसाइटी (Theosophical Society) के कार्यकर्ताओं से हुई। थियोसोफिकल सोसाइटी की शुरुआत 1875 में हिन्दू (Hindu) और बौद्ध (Buddhist) साहित्य के अध्ययन के लिए हुई थी और इसका एकमात्र उद्देश्य सार्वभौमिक भाईचारा था। उन्होंने गाँधी जी को भगवत गीता (Bhagwat Geeta) का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया।

बार का बुलावा

जून 1891 में गाँधी जी को बार से बुलावा आया और वो लंदन छोड़कर भारत के लिए चल दिए। उस समय उनकी आयु केवल 22 वर्ष थी  भारत आने पर उन्हें पता चला कि उनकी माता जी का स्वर्गवास उनके लंदन प्रवास कि दौरान हो चूका था और उनके परिवार ने ये खबर उनसे छुपाई थी। मुंबई में वकालत करने में उन्हें काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा और अंत में हारकर वो अपने घर राजकोट चले गए।

1893 में काठियावाड़ (Kathiawar) क़े एक मुस्लिम व्यापारी दादा अब्दुल्लाह ने गाँधी जी से संपर्क किया। उनका दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में जहाजों का व्यापार था। उनके जोहानसबर्ग (Johannesburg) में रहने वाले दूर क़े भाई को एक वकील की आवश्यकता थी और वो काठियावाड़ क़े ही किसी व्यक्ति को रखना चाह रहे थे। ये एक साल का काम था जिसमें गाँधी जी को £105 प्रतिमाह मिलने थे। इस दौरान गाँधी जी को दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में कॉलोनी ऑफ़ नाटल (Colony of Natal) जो की एक ब्रिटिश कॉलोनी थी में रहना था।

नागरिक अधिकारों की लड़ाई – Civil Rights Fight (1893-1914)

1893 में 23 वर्ष क़े आयु में गाँधी जी ने दक्षिण अफ्रीका का सफर शुरू किया। वहाँ वे 21 साल रहे। इन सालों में उन्होंने राजनीति की समझ बूझ आ गयी। दक्षिण अफ्रीका पहुँचने क़े फ़ौरन बाद ही गाँधी जी को भेदभाव का सामना करना पड़ा। उन्होंने देखा कि किस तरह से लोगों कि साथ उनके रंग और पृष्ठभूमि को लेकर भेदभाव का सामना करना पड़ता है। किन्तु 1894 में उनके भारत लौटने का समय आ गया। उसी समय नाटल सरकार ने एक विधेयक पारित कर वहाँ कि लोंगो को चुनाव कि अधिकार से वंचित कर दिया। इसी समय गाँधी जी की वापसी की तैयारियां चल रही थीं लेकिन उन्होंने वहीं रूककर वहाँ कि लोंगो कि नागरिक अधिकारों कि लिए लड़ने का फैसला किया।

दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए गाँधी जी ने पहले भारतियों पर ही ध्यान दिया और आगे चलकर नाटल इंडियन कांग्रेस (Natal Indian Congress) की स्थापना की। शुरुआत में उन्होंने केवल भारतीय लोगों की ही समस्याएं सुनीं पर धीरे धीरे वो अफ्रीकी लोगों की समस्याओं पर भी ध्यान देने लगे। 1906 में जब ब्रिटैन ने ज़ुलु राज्य (Zulu Kingdom) के खिलाफ जंग शुरू की तो गाँधी जी ने भारतीय स्वयंसेवकों को ज़ुलु (Zulu) लोगों की मदद करने को कहा। अंगेर्जों ने उनका रास्ता रोकने की कोशिश की लेकिन वे आगे बढ़ते गए। अंत में 1910 में उन्होंने अपने की मित्र हेर्मन्न कॉलेनबाश (Hermann Kallenbach) की मदद से जोहानसबर्ग (Johannesburg) के नज़दीक एक आदर्शवादी समुदाय (idealist community) बनाने का फैसला किया। इसका नाम टॉलस्टॉय फार्म (Tolstoy Farm) रखा गया।

Mahatma Gandhi’s Contribution to Indian Freedom Struggle (1915-1947)

1915 में महात्मा गाँधी गोपाल कृष्ण गोखले (Gopal Krishna Gokhale) के बुलावे पर भारत आ गए। यहां गाँधी जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (Indian National Congress) में शामिल हुए और गोखले के सान्निध्य में भारतीय राजनीति से रूबरू हुए। गोखले उस समय कांग्रेस के एक बड़े नेता हुए करते थे। लेकिन उन्हें नरम दल का नेता माना जाता था। गाँधी जी ने भी गोखले की उदारवादी सोच को अपनाया। गाँधी जी 1920 में कांग्रेस के अध्यक्ष बने और 26 जनवरी 1930 तक complete independence की मांग करने तक नागरिक अधिकारों की मांगें उठाते रहे।

चम्पारण सत्याग्रह – Champaran Satyagrah

1917 में बिहार (Bihar) के चम्पारण (Champaran) में किसानों ने ब्रिटिश जमींदारों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। किसान जबरन कराई जा रही नील की खेती (indigo farming) का विरोध कर रहे थे। चम्पारण के किसानों ने महात्मा गाँधी से सहयोग माँगा। हिंदुस्तान में यह गाँधी का पहला राजनीतिक प्रयोग था। यहां उन्होंने अहिंसक विरोध (Non-Violent movement) से अंग्रेज प्रशासन को चौंका दिया और प्रशासन को किसानों को रियायत देनी पड़ी।

खेड़ा सत्याग्रह – Kheda Satyagrah

1918 में बाढ़ और सूखे की मार से जूझ रहे खेड़ा (Kheda) के किसानों ने कर में रियायतें देने की मांग की किन्तु प्रशासन झुकने को तैयार नहीं हुआ। महात्मा गाँधी (Mahatma Gandhi) ने खेड़ा जाकर किसानों के लिए लड़ने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने स्वयंसेवकों को तैयार किया जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण नाम था वल्लभभाई पटेल (Vallabhbhai Patel) का। असहयोग (non-cooperation) का तरीका अपनाते हुए गाँधी जी ने किसानो को कर न देने की सलाह दी (non-payment of revenue) और इसके लिखे एक हस्ताक्षर अभियान भी चलाया। 5 महीने तक चले संघर्ष के बाद मई 1918 को प्रशासन ने सूखा खत्म होने तक करों में रियायत देने की घोषणा की। इस आंदोलन में वल्लभभाई पटेल (Vallabhbhai Patel) ने किसानों का प्रतिनिधित्व किया और अंग्रेजों ने उनकी बात मानते हुए करों में छूट दी और बंदियों को रिहा किया।

खिलाफत आंदोलन – Khilafat movement

1919 में प्रथम विश्व युद्ध (World War I) के शुरू हो गया। गाँधी जी उस समय 49 वर्ष के थे। इस युद्ध में मुस्लिम ओटोमन एम्पायर (Ottoman Empire) ब्रिटिश सेना से हार गया था। गाँधी जी ने ओटोमन एम्पायर (Ottoman Empire) को सहयोग देकर मुस्लिमों का सहयोग हासिल करने की कोशिश की। इससे पहले वे अंग्रेजों का सहयोग कर रहे थे। उन्हें उम्मीद थी की अंग्रेज युद्ध की समाप्ति पर भारत को स्वराज (self-rule) का अधिकार दे देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अंग्रेजों ने स्वराज (self-government) के स्थान पर मामूली रियायतें दे दीं। नाराज़ होकर गाँधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ अपनी जंग में मुसलमानों से सहयोग की अपील की। इसके विरोध में अंग्रेज रौलट एक्ट (Rowlatt Act) लेकर आये जिसने उन्हें सविनय अवज्ञा (civil disobedience) आंदोलन का दमन करने का अधिकार दे दिया।

खिलाफत आंदोलन से गाँधी जी मुसलमानों का सहयोग पाने में सफल रहे और हिन्दू मुस्लिम के इस गठजोड़ ने गाँधी को एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित कर दिया। इस समय उन्हें कुछ विरोध का भी सामना करना पड़ा जैसे कि रबीन्द्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) ने उनके ओटोमन एम्पायर (Ottoman Empire) के लिए चल रहे खलीफा (Caliph) आंदोलन समर्थन पैर सवाल उठाये। लेकिन खिलाफत आंदोलन ने मुहम्मद अली जिन्नाह (Muhammad Ali Jinnah) जैसे नेताओं को जो कि सविनय अवज्ञा (civil disobedience) का विरोध कर रहे थे, को किनारे लगा दिया। लेकिन 1922 में टर्की के अतातुर्क (Turkey’s Atatürk) ने खलीफा (Caliphate) का अंत कर दिया और इसके साथ ही भारत में चल रहे खिलाफत आंदोलन (Khilafat movement) का भी अंत हो गया। इसके साथ ही गाँधी को मिल रहा मुसलमानों का सहयोग भी खत्म हो गया और बड़ी संख्या में मुसलमान कांग्रेस छोड़कर जाने लगे।

असहयोग आंदोलन – Non Cooperation Movement

अपनी किताब हिन्द स्वराज (Hind Swaraj) (1909) में गाँधी जी ने लिखा था कि अंग्रेजों ने हिन्दुस्तानियों के सहयोग से ही अपने यहां अपना साम्राज्य स्थापित किया है। उस समय उनकी आयु 40 वर्ष थी। फरवरी 1919 में उन्होंने भारत के तब के वाइसराय (viceroy) को आगाह किया कि यदि अंग्रेजों ने Rowlatt Act लागू किया तो वो असहयोग आंदोलन (noncooperation movement) शुरू कर देंगे। लेकिन वाइसराय ने उनकी बात नहीं मानी और Rowlatt Act लागू कर दिया।

रौलट एक्ट (Rowlatt Act) लागू होने के साथ ही गाँधी जी ने सारे देश में असहयोग आंदोलन (Non Cooperation Movement) शुरू कर दिया जिस दौरान कई हिंसक घटनाएं भी हुईं जिनमें 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग़ हत्याकांड (Jallianwala Bagh massacre) प्रमुख हैं। इससे पहले 9 अप्रैल को गाँधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया था। उनकी गिरफ़्तारी और जलियांवाला बाग़ हत्याकांड के बाद देश हिंसा कि आग में जलने लगा जिसमें 4 फरवरी 1922 का चौरी चौरा काण्ड (Chauri Chaura incident) प्रमुख है। हिंसा रोकने के लिए गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया। उनकी इस अपील पर हिंसा शांत हो गयी और इसके साथ ही उन्होंने अपने असहयोग आंदोलन को भी विराम दे दिया। अब गाँधी जी को लगने लगा कि अंग्रेज कभी भी हिन्दुस्तानियों को बराबरी का दर्जा नहीं देंगे इसीलिए उन्होंने स्वराज का नारा दिया।

1921 में गाँधी जी कांग्रेस के अध्यक्ष बने और उन्होंने Non Cooperation Movement को स्वराज (self-rule) से जोड़ दिया। उन्होंने गरीब और अमीर सभी से आग्रह किया कि सब लोग विदेशी सामानों का बहिष्कार करें और खादी अपनाएं। गाँधी जी ने स्वयं भी चरखा चलना शुरू कर दिया। गाँधी जी 10 मार्च 1922 को गिरफ्तार कर लिए गए और 18 मार्च 1922 को उन्हें जेल भेज दिया गया। उनके जेल जाते ही कांग्रेस कि भीतरी कलह खुलकर सामने आ गयी। कांग्रेस खुद दो खेमों में बाँट गयी और मुसलामानों ने कांग्रेस छोड़कर अपने अलग मुस्लिम संगठन बनाने शुरू कर दिए।

नमक सत्याग्रह (डांडी यात्रा) – Salt Satyagrah, Daandi March

1924 में जेल से छूटने के बाद 20वीं सदी कि शुरुआत तक गाँधी जी स्वराज (self-rule) के लिए लड़ते रहे। इसके लिए उन्होंने 1928 में कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में डोमिनियन स्टेटस (dominion status) के लिए एक प्रस्ताव पारित करवाया और अस्वीकार करने पर असहयोग आंदोलन शुरू करने का ऐलान किया। अपनी बात मनवाने के लिए गाँधी जी ने 31 दिसंबर 1929 को लाहौर (Lahore) में तिरंगा (tricolor) फहराया और 26 जनवरी 1930 को लाहौर में स्वतंत्रता दिवस मनाया। गाँधी जी के आव्हान पर सारे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। इसके बाद मार्च 1930 में गाँधी जी ने नमक कर के खिलाफ सत्याग्रह करने का फैसला किया।

नमक सत्याग्रह को साल्ट मार्च (salt march) या डांडी यात्रा (Daandi Yatra) के नाम से भी जाना जाता है। ये सत्याग्रह 12 मार्च से 6 अप्रैल तक चला। इसमें कुल 78 स्वयंसेवकों ने भाग लिया। स्वयंसेवक 388 किलोमीटर कि दूरी तय करके अहमदाबाद से डांडी पहुंचे और नमक बनाया। यह यात्रा 25 दिन में पूरी हुई जिसमें गाँधी जी ने हजारों लोगों को सम्बोधित किया। 5 मई को गाँधी जी को डांडी यात्रा के लिए गिरफ्तार कर लिया गया।

वार्ता – Negotiation

अंग्रेजों के प्रतिनिधि लार्ड इरविन (Lord Irwin) ने महात्मा गाँधी के साथ वार्ता कि पेशकश की जिसका नतीजा गाँधी – इरविन समझौते (Gandhi-Irwin pact) के रूप में सामने आया। 1921 में हुए इस समझौते के अनुसार अंग्रेजों ने सभी राजनीतिक बंदियों को रिहा करने का फैसला किया और गाँधी जी ने अपना असहयोग आंदोलन (noncooperation movement) वापिस लेने का फैसला किया। इसके साथ ही गाँधी जी ने लंदन (London) में हो रहे गोल मेज सम्मलेन (round table conference) में भाग लेने के लिए भी अपनी स्वीकृति दे दी।

गोल मेज सम्मलेन – Round Table Conference (1931-32)

गाँधी जी कि आयु 62 वर्ष थी जब वो गोल मेज सम्मलेन (round table conference) में भाग लेने लंदन गए। वहाँ उन्होंने संवैधानिक प्रिक्रिया द्वारा स्थापित स्वराज कि मांग की लेकिन अंग्रेज भारत को अपनी कॉलोनी बनाये रखना चाहते थे। इतना ही नहीं उन्होंने भारत को ब्रिटिश डोमिनियन मॉडल (British Dominion model) के अंतर्गत कुछ अधिकार देने की बात कही। इसी समय उन्होंने भारत में धर्म और जाती के आधार पर चुनाव करने का फैसला किया। अंग्रेजों ने कांग्रेस और गाँधी जी के भारतियों कि ओर से बोलने के अधिकार को भी चुनौती दी।

दुसरे गोल मेज सम्मलेन से वापिस आने के बाद गाँधी जी ने एक नया सत्याग्रह शुरू किया जिसके लिए उन्हें गिरफ्तार करके येरवडा जेल (Yerwada jail) भेज दिया गया। गाँधी जी के जेल जाते ही अंग्रेजों ने अछूतों (untouchables) के लिए एक नया कानून बनाया जिसे कम्युनल अवार्ड (Communal Award) का नाम दिया गया। इसे अंतर्गत अछूतों को अलग निर्वाचन का अधिकार दिया गया। इस अधिकार कि सब जगह आलोचना हुई।

दूसरा विश्व युद्ध और भारत छोड़ो आंदोलन – World War II and Quit India movement

दुसरे विश्व युद्ध (World War II) में गाँधी जी अंग्रेजों का साथ न देने के पक्ष में थे। उनका मानना था कि जो युद्ध लोकतान्त्रिक स्वतंत्रता (democratic freedom) के लिए लड़ा जा रहा है उसमें हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजों का साथ देने कि कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन उनकी इस अपील का जनमानस पर कोई असर नहीं हुआ और बड़ी संख्या में हिंदुस्तानी ब्रिटिश फ़ौज का हिस्सा हो गए।

1942 में 73 वर्ष की आयु में गाँधी जी ने एक बार फिर हिन्दुस्तानियों को अंग्रेजी सरकार का किसी भी तरह से सहयोग करने से मना किया। इस बार उन्होंने कहा कि यह आंदोलन किसी भी कीमत पर नहीं रुकेगा क्युकी अंग्रेजों द्वारा की जा रही हिंसा हिन्दुस्तानियों कि व्यक्तिगत हिंसा से ज्यादा क्रूर है। इसी समय उन्होंने करो या मारो (do or die) का नारा दिया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार करके पुणे (Pune) के आगा खान पैलेस (Aga Khan Palace) में रखा गया। 1 मई 1944 को दुसरे विश्व युद्ध कि सम्पति के पहले गाँधी जी को उनकी गिरती हुए सेहत के चलते रिहा कर दिया गया।

बंटवारा और स्वतंत्रता – Partition and Independence

गाँधी जी बंटवारे (partition) के सख्त खिलाफ थे। इसे रोकने के लिए उन्होंने मुहम्मद अली जिन्नाह (Muhammad Ali Jinnah) के सामने एक प्रस्ताव भी रखा था। उनका सुझाव था कि सम्पूर्ण स्वतंत्रता मिलने तक हिन्दू और मुस्लिम दोनों साथ मिलकर लड़ें और बाद में बंटवारा कर लें लेकिन जिन्नाह ने उनका ये प्रस्ताव ठुकरा दिया। गाँधी जी ने भारत छोड़ो (Quit India) का नारा दिया तो जिन्नाह ने बंटवारा करो और भारत छोड़ो (Divide and Quit India) का नारा दिया। इतना ही नहीं जिन्नाह ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे (Direct Action Day) का ऐलान किया। 15 अगस्त 1947 को गाँधी ने स्वतंत्रता दिवस (independence day) न मानाने का फैसला किया। सारा भारत बंटवारे की आग में जल रहा था और गाँधी जी ने उपवास रखने का फैसला किया।

मृत्यु – Death of Mahatma Gandhi

30 जनवरी 1948 कि सुबह 5:17 बजे बिरला हॉउस (Birla House) में जिसे अब गाँधी स्मृति (Gandhi Smriti) के नाम से जाना जाता है एक हिन्दू राष्ट्रवादी (Hindu nationalist) नेता नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) ने गोली मारकर गाँधी जी कि हत्या कर दी। गाँधी जी उस समय एक प्रार्थना सभा में भाग लेने जा रहे थे। तब के Prime Minister Jawahar Lal Nehru ने All India Radio से गाँधी जी कि मृत्यु का समाचार दिया। गाँधी जी कि मृत्यु से सारे देश में शोक कि लहर दौड़ गयी।

शहीद स्मारक – Memorials of Mahatma Gandhi

गाँधी जी का अंतिम संस्कार हिन्दू रीति रिवाजों के अनुसार किया गया और 12 फरवरी 1948 को उनकी अस्थियां इलाहबाद (Allahabad) के संगम (Sangam) में बहा दी गयीं। यमुना किनारे जिस जगह गांधी जी का अंतिम संस्कार हुआ वहाँ राज घाट (Raj Ghat) स्मारक बना दिया गया और एक काले संगमरमर के टुकड़े पर उनके अंतिम शब्द “हे राम” (Hey Ram) लिखवा दिए गए।

महात्मा गाँधी के अनमोल विचार

  • खुद वो बदलाव बनिए जो आप दुनिया में देखना चाहते हैं।
  • आपको मानवता में विश्वास नहीं खोना चाहिए।
  • खुद को खोजने का सबसे अच्छा तरीका है, खुद को दूसरों की सेवा में खो दो।
  • व्यक्ति अपने विचारों से निर्मित प्राणी है, वह जो सोचता है वही बन जाता हैं।
  • आँख के बदले में आँख पूरे विश्व को अँधा बना देगी।
  • शक्ति शारीरिक क्षमता से नहीं आती है। यह एक अदम्य इच्छा शक्ति से आती है।
  • थोड़ा सा अभ्यास बहुत सारे उपदेशों से बेहतर हैं।
  • विश्वास को हमेशा तर्क से तौलना चाहिए।
  • भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि आज आप क्या कर रहे हैं।
  • मौन सबसे सशक्त भाषण है। धीरे-धीरे दुनिया आपको सुनेगी।

साहित्यिक कार्य – Mahatma Gandhi’s Literary Work

गाँधी जी एक बहुमुखी प्रतिभा वाले लेखक थे। उन्होंने कई किताबें लिखीं और अख़बार भी निकाले। उनकी पहली किताब हिन्द स्वराज (Hind Swaraj) 1909 में छपी। गुजराती में लिखी इस किताब में भारत कि स्वतंत्रता का खाका तैयार किया गया था। इसका इंग्लिश में भी अनुवाद किया गया था। उन्होंने कई अखबारों का संपादन भी किया जिसमें हरिजन (Harijan) प्रमुख है। इस अख़बार का संपादन गुजराती, हिंदी और इंग्लिश भाषा में किया गया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने दक्षिण अफ्रीका (South Africa) में इंडियन ओपिनियन (Indian Opinion) निकला। उन्होंने इंग्लिश भाषा में यंग इंडिया (Young India) निकाला और हिंदुस्तान आने के बाद गुजराती भाषा में नवजीवन (Navjivan) नाम से एक मासिक पत्रिका भी निकाली। बाद में नवजीवन (Navjivan) का हिंदी भाषा में भी संपादन किया गया।

Mahatma Gandhi ने गुजराती में अपनी जीवनी सत्य के साथ मेरे प्रयोगों की कहानी (The Story of My Experiments with Truth) भी लिखी। 1960 में भारत सरकार ने गाँधी जी के सभी साहित्यिक कार्यों को महात्मा गांधी के संग्रहित कार्य (The Collected Works of Mahatma Gandhi) के अंतर्गत प्रकशित करने का निश्चय किया।

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