Muharram - मुहर्रम क्या है, जानिए इसका पूरा इतिहास

Muharram – मुहर्रम क्या है, जानिए इसका पूरा इतिहास

फेस्टिवल

मुस्लिम समुदाय का मातमी पर्व मोहर्रम मनाया जाता है. दरअसल मुहर्रम एक महीना है, इसी महीने से इस्लाम धर्म के नए साल की शुरूआत होती है. मोहर्रम की 10 तारीख को हजरत इमाम हुसैन की शहादत की याद में मातम जाता है. इस दिन हजरत इमाम हुसैन के फॉलोअर्स खुद को तकलीफ देकर इमाम हुसैन की याद में मातम मनाते हैं. चलिए बताते हैं आपको इससे जुड़ा हुआ पूरा इतिहास…

मुहर्रम क्या है – What is Muharram

मुहर्रम इस्लामिक वर्ष का पहला महीना होता है. ये पर्व इस महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. इस त्योहार को मनाने की वजह इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में मनाया जाता है.

ये पर्व चांद नजर आने के साथ ही 21 या 22 अगस्त से शुरू होगा. इस शिया मुस्लिम समुदाय के लोग गम के रूप में मनाते हैं. इस दिन इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की शहादत को याद किया जाता है.

कहा जाता है कि मुहर्रम के एक रोजे का 30 रोजों के बराबर का फल मिलता है. मोहर्रम महीने की 10वीं तारीख को ताजिया जुलूस निकाला जाता है.  इस जुलूस में ताजिया लकड़ी और कपड़ों से गुंबदनुमा बनाया जाता है. इसके बाद इसमें इमाम हुसैन की कब्र का नकल बनाया जाता है, इसे झांकी की तरह सजाकर एक शहीद की अर्थी की तरह इसका सम्मान करते हुए इसे कर्बला में दफन करते हैं. 

मुहर्रम क्यों मनाया जाता है Why Muharram is Celebrated

मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयाइयों का कत्ल कर दिया गया था. हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे.

भारत में मोहर्रम का त्यौहार कैसे मनाया जाता है

इस दिन को लोग करबला के खूनी युद्ध का भाषण सुनते हैं, संगीत से बचते हैं, और शादी विवाह जैसे खुशहाल अवसरों पर नहीं जाते हैं. मुहर्रम के 10वें दिन, वो रंगीन बैनरों और बांस और कागत के शहीद चित्रणों के साथ सड़कों पर उतरते हैं. इस जुलूस के दौरान, वो नंगे पैर चलते हैं और विलाप करते हैं. कुल लोग अपने आपको खून निकालने तक कोड़े भी मारते हैं जबकि कुछ लोग नाचकर करबला के युद्ध का अभिनय करते हैं.

मुहर्रम के रोज़े की सहरी की जाती है या नहीं इस्लामिक कैलेंडर के पहले व मुस्लिम समुदाय के पाक महीने मुहर्रम का के 10वां दिन आशुरा कहा जाता है. इस दिन तक मुस्लिम समुदाय के लोग लगातार रोजे रखते हैं. माना जाता है कि इस दौरान रखे गए हर रोजे का सवाब 30 रोजों के बराबर होता है. आखिर क्या होता है इन रोजों का महत्व और मुहर्रम के महीने में सिर्फ 10 दिन ही क्यों रखे जाते हैं.

दरअसल हजरत मुहम्मद के साथ इब्ने अब्बास के मुताबिक, हजरत मुहम्मद ने कहा था कि जो मुहर्रम की 9वीं तारीख का रोजा रखता है, उसके 2 साल के गुनाह माफ हो जाते हैं. वहीं, मुहर्रम के एक रोजे का सवाब 30 रोजों के बराबर होता है. हालांकि, यह रोजे अनिवार्य नहीं हैं, लेकिन मुहर्रम के रोजों का सवाब बहुत माना जाता है.

मुहर्रम का इतिहास या कहानी – Muharram History

 ये वक्त सन् 60 हिजरी का थी. कर्बला जिसे सीरिया के नाम से जाना जाता था. वहां यजीद इस्लाम का शहनशाह बनना चाहता था, जिसके लिए उसने आवाम में खौफ फैलाना शुरू कर दिया था. उसने सभी को अपने सामने गुलाम बनाने के लिए यातनायें देनी शुरू कर दी. यजीद पुरे अरब पर अपना रुतबा चाहता था, लेकिन उसके तानाशाह के आगे हजरत मुहम्मद का वारिस इमाम हुसैन और उसके भाईयों ने घुटने नहीं टेके और जमकर मुकाबला किया.

बादशाह इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मदीना से इराक के शहर कुफा जाने लगे लेकिन रास्ते में यजीद की फौज ने कर्बला के रेगिस्तान पर इमाम हुसैन के काफिले को रोक दिया.

वह दो मुहर्रम का दिन था, जब हुसैन का काफिला कर्बला के तपते रेगिस्तान पर रुका. वहां पानी का एकमात्र स्त्रोत फरात नदी थी, जिस पर यजीद की फौज ने 6 मुहर्रम से हुसैन के काफिले पर पानी के लिए रोक लगा दी थी. बावजूद इसके, इमाम हुसैन नहीं झुके. यजीद के प्रतिनिधियों की इमाम हुसैन को झुकाने की हर कोशिश नाकाम होती रही और आखिर में युद्ध का ऐलान हो गया.

इतिहास के मुताबिक यजीद की 80,000 की फौज के सामने हुसैन के 72 बहाहुरों ने जिस तरह जंग की, उसकी मिसाल खुद दुश्मन फौज के सिपाही एक दूसरे को देने लगे. लेकिन हुसैन कहां जंग जीतने आए थे, वो तो अपने आपको अल्लाह की राह में कुर्बान करने आए थे.

10वें मुहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे और आखिर में खुद अकेले युद्ध किया फिर भी दुश्मन उन्हें मार नहीं सका.

अंत में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन खुदा का सजदा कर रहे थे, एक एक यजीदी को लगा कि शायद यही एक मौका है कि जब हुसैन को मारा जाता है.फिर, उसने धोखे से हुसैन को शहीद कर दिया. लेकिन इमाम हुसैन मरकर भी जिंदा रहे और हमेशा के लिए अमर हो गए, पर यजीद जीतकर भी हार गए. तख्तो ताज जीतकर भी ये लड़ाई यजीद के लिए एक बड़ी हार थी. उस दिन से आज तक मुहर्रम के महीने को शहीद की शहादत के रूप में याद करते हैं.

बीबी फातिमाहसन और हुसैन, यजीद

इस्लाम धर्म के पहरुआ पैगंबर मोहम्मद साहब के नवासे व उनकी पुत्री बीबी फातिमा के पुत्र इमाम हसन व हुसैन ने इंसानियत की रहनुमाई के लिए खुद की शहादत कर दी थी. जिनकी याद में गमजदा को पर्व मोहर्रम मनाया जाता है.

हसन हुसैन इस्लाम के असली वालिद थे. सो इंसानियत के रास्ते पर चलने के कारण खलिफा पद पर उनकी ही दावेदारी बनती थी. परंतु सिरफ्रों ने इसका विरोध करते हुए उनसे बगावत कर टकराहट की राह अपनाई. वो इस दुमान में थे कि उनके पास लड़ाकों का माकूल फौज है. फिर बी नेमत पर कायम रहते हुए भारी-भरकम फौज के साथ 71 की संख्या में समर्थकों के साथ हसन-हुसैन जंग लड़े और शहीद हो गए. जिसके बाद वहां की अवाम की मुखालफल में उतर गई और बगावत करते हुए उन्हें शिकस्त दी.

कौन हैं इमाम हुसैन

वही हुसैन, जो सुन्नी मुस्लिमों के चौथे खलीफा और शिया मुस्लिम के पहले इमाम कहे जाने वाले हजरत अली के बेटे थे. ये वो हुसैन हैं जो पैगंबर मुहम्मद साहब की बेटी फातिमा के बेटे थे. 6-7 साल के थे तभी उनकी मां इस दुनिया को छोड़ चुकी थी. ये वो हुसैन हैं, जिनको कर्बला में खंजर से गला काटकर मारा गया.

कहा जाता है कि कर्बला की जंग दो शहजादों के बीच की जंग नहीं थी. बल्कि ये इस्लाम की वो जंग थी. जिसमें एक तरफ हुसैन थे और दूसरी तरफ यजीद था. हुसैन चाहते थे, वो दीन ए इस्लाम चले, जो उनके नाना मुहम्मद साहब ने चलाया. लेकिन यजीद चाहते थे कि सबकुछ उनके ही मुताबिक हो.

इतिहासकारों के मुताबिक यजीद हुसैन से अपनी बात मनवाने के लिए संधि करना चाहता था कि वो इस्लाम, इस्लाम की बात न करें और जैसा वो कहे वैसा करें. लेकिन हुसैन ने उसकी बात मानने से इंकार कर दिया. उन्होंने कहा कि हक बात  करूंगा, कुरान की बात करूंगा. अल्लाह एक है और मुहम्मद साहब उसके पैगंबर हैं ये कहना नहीं छोडूंगा.

कर्बला का युद्ध – Battle of the camel

यजीद की 80,000 की फौज के सामने हुसैन के 72 बहाहुरों ने जिस तरह जंग की, उसकी मिसाल खुद दुश्मन फौज के सिपाही एक दूसरे को देने लगे. लेकिन हुसैन कहां जंग जीतने आए थे, वो तो अपने आपको अल्लाह की राह में कुर्बान करने आए थे.

10वें मुहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे और आखिर में खुद अकेले युद्ध किया फिर भी दुश्मन उन्हें मार नहीं सका.

अंत में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन खुदा का सजदा कर रहे थे, एक एक यजीदी को लगा कि शायद यही एक मौका है कि जब हुसैन को मारा जाता है.फिर, उसने धोखे से हुसैन को शहीद कर दिया. लेकिन इमाम हुसैन मरकर भी जिंदा रहे और हमेशा के लिए अमर हो गए, पर यजीद जीतकर भी हार गए. तख्तो ताज जीतकर भी ये लड़ाई यजीद के लिए एक बड़ी हार थी. उस दिन से आज तक मुहर्रम के महीने को शहीद की शहादत के रूप में याद करते हैं.

इमाम हुसैन कर्बला स्टोरी इन हिंदी

बादशाह इमाम हुसैन अपने परिवार और साथियों के साथ मदीना से इराक के शहर कुफा जाने लगे लेकिन रास्ते में यजीद की फौज ने कर्बला के रेगिस्तान पर इमाम हुसैन के काफिले को रोक दिया.

वह दो मुहर्रम का दिन था, जब हुसैन का काफिला कर्बला के तपते रेगिस्तान पर रुका. वहां पानी का एकमात्र स्त्रोत फरात नदी थी, जिस पर यजीद की फौज ने 6 मुहर्रम से हुसैन के काफिले पर पानी के लिए रोक लगा दी थी. बावजूद इसके, इमाम हुसैन नहीं झुके. यजीद के प्रतिनिधियों की इमाम हुसैन को झुकाने की हर कोशिश नाकाम होती रही और आखिर में युद्ध का ऐलान हो गया.

इतिहास के मुताबिक यजीद की 80,000 की फौज के सामने हुसैन के 72 बहाहुरों ने जिस तरह जंग की, उसकी मिसाल खुद दुश्मन फौज के सिपाही एक दूसरे को देने लगे. लेकिन हुसैन कहां जंग जीतने आए थे, वो तो अपने आपको अल्लाह की राह में कुर्बान करने आए थे.

10वें मुहर्रम के दिन तक हुसैन अपने भाइयों और अपने साथियों के शवों को दफनाते रहे और आखिर में खुद अकेले युद्ध किया फिर भी दुश्मन उन्हें मार नहीं सका.

अंत में अस्र की नमाज के वक्त जब इमाम हुसैन खुदा का सजदा कर रहे थे, एक एक यजीदी को लगा कि शायद यही एक मौका है कि जब हुसैन को मारा जाता है.फिर, उसने धोखे से हुसैन को शहीद कर दिया. लेकिन इमाम हुसैन मरकर भी जिंदा रहे और हमेशा के लिए अमर हो गए, पर यजीद जीतकर भी हार गए. तख्तो ताज जीतकर भी ये लड़ाई यजीद के लिए एक बड़ी हार थी. उस दिन से आज तक मुहर्रम के महीने को शहीद की शहादत के रूप में याद करते हैं.

कर्बला के बाद क्या हुआ

मुहर्रम इस्लामिक वर्ष का पहला महीना होता है. ये पर्व इस महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. इस त्योहार को मनाने की वजह इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में मनाया जाता है.

लगभग हर कोई हुसैन की शहादत की बात करता है और हुसैन ब्राह्मण या दत्त के 7 बेटों की कहानी भी लोगों के बीच कही जाती है, लेकिन कर्बला के युद्ध में याजिद के खिलाफ लड़ाई में हुसैन के परिवार के कई लोग कुर्बान हुए थे. उस लड़ाई में हिस्सा लिया था एक ऐसी शख्सियत ने जिसका नाम इतिहास के पन्नों में उतना मशहूर नहीं है.

ये नाम है हुसैन की बहन जैनब का. ये वही बीबी जैनब हैं जो कर्बला के युद्ध के समय एक लीडर बनकर उभरी थीं. अगर जैनब न होतीं तो हुसैन को शायद सिर्फ एक ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाता जिसने तत्कालीन राजा के खिलाफ युद्ध छेड़ा था.

हुसैन और उनके परिवार के पुरुष सदस्य तो कर्बला में शहीद हो गए थे, लेकिन जैनब के भाषण और उपदेश ही थे जिन्होंने हुसैन की कुर्बानी को लोगों के बीच पहुंचाया था. हुसैन की मौत तो कर्बला के युद्ध में 680ad या 61 हिजरी के दसवें मुहर्रम में ही हो गई थी. हुसैन ने अपनी लड़ाई लड़ ली थी अब जैनब की बारी थी.

11 वें मुहर्रम के दिन महिलाएं, बच्चे और हुसैन का बेटा जैन उल अबीदिन याजिद की सेना द्वारा कैद कर लिए गए थे और कुफा के गवर्नर की अदालत में पेश किए जाने थे.

कुफा वो शहर था जहां जैनब और उनकी बहन उम्मे कुलसुम ने महिलाओं को कुरान के पाठ पढ़ाए थे. पैगंबर की नवासी जैनब अपने पिता अली और भाई बहन के साथ इसी शहर में रही थीं.

इसी शहर में बंदी बनाकर जैनब को लाया गया. जैसे ही कारवां कुफा में पहुंचा वहां लोगों की भीड़ लग गई उन लोगों को देखने के लिए जिन्हें सत्ता ने गद्दार साबित कर दिया था. कहा जाता है कि जिनकी मौत हुई थी कर्बला के युद्ध में उनका सिर लाने को कहा गया था और उस समय हुसैन और हसन का सिर लिए जैनब चली आ रही थीं. उन्होंने उसी समय जैनब ने अपना पहला उपदेश दिया.

उसी समय जैनब ने अपना पहला उपदेश दिया. जब लोग उन्हें गद्दार समझ रहे थे. लोगों की आवाज में जैनब की आवाज दब गई और जैनब ने जोर से चिल्ला कर लोगों के बीच अपनी बात पहुंचाई. वो उसी तरह से बोल रही थीं जैसे उनके पिता इमाम अली बोलते थे.

इमाम हसन की कहानी

इमाम हसन हुसैन के भाई थे.शिया मुसलमानों में, हसन दूसरे इमाम के रूप में पूजनीय हैं. शिया मुसलमानों में, हसन दूसरे इमाम के रूप में पूजनीय हैं. हसन ने अपने पिता की मृत्यु के बाद खिलाफत का दावा किया, लेकिन पहली फितना को समाप्त करने के लिए उमैयद वंश के संस्थापक मुवियाह प्रथम के छह या सात महीने के बाद उसे छोड़ दिया गया.

इमाम हसन की शहादत कैसे हुई

अल-हसन को गरीबों के लिए दान करने, गरीबों और बंधुआ लोगों के लिए उनकी दया और उनके ज्ञान, सहिष्णुता और बहादुरी के लिए जाना जाता था. शेष जीवन के लिए, हसन मदीना में रहे, जब तक कि उनकी मौत 45 साल की उम्र में हो घई और उन्हें मदीना में जन्नत अल-बाकी कब्रिस्तान में दफनाया गया. कहा जाता है इमाम हसन की जहर से हत्या हुई थी. जिसका आरोप उनकी पत्नी जैदा बिंट अल-अश्अत पर  लगाया जाता है.

इमाम हुसैन की शहादत के बाद का वाक्या

मुहर्रम इस्लामिक वर्ष का पहला महीना होता है. ये पर्व इस महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. इस त्योहार को मनाने की वजह इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में मनाया जाता है.

लगभग हर कोई हुसैन की शहादत की बात करता है और हुसैन ब्राह्मण या दत्त के 7 बेटों की कहानी भी लोगों के बीच कही जाती है, लेकिन कर्बला के युद्ध में याजिद के खिलाफ लड़ाई में हुसैन के परिवार के कई लोग कुर्बान हुए थे. उस लड़ाई में हिस्सा लिया था एक ऐसी शख्सियत ने जिसका नाम इतिहास के पन्नों में उतना मशहूर नहीं है.

ये नाम है हुसैन की बहन जैनब का. ये वही बीबी जैनब हैं जो कर्बला के युद्ध के समय एक लीडर बनकर उभरी थीं. अगर जैनब न होतीं तो हुसैन को शायद सिर्फ एक ऐसे योद्धा के रूप में याद किया जाता जिसने तत्कालीन राजा के खिलाफ युद्ध छेड़ा था.

हुसैन और उनके परिवार के पुरुष सदस्य तो कर्बला में शहीद हो गए थे, लेकिन जैनब के भाषण और उपदेश ही थे जिन्होंने हुसैन की कुर्बानी को लोगों के बीच पहुंचाया था. हुसैन की मौत तो कर्बला के युद्ध में 680ad या 61 हिजरी के दसवें मुहर्रम में ही हो गई थी. हुसैन ने अपनी लड़ाई लड़ ली थी अब जैनब की बारी थी.

11 वें मुहर्रम के दिन महिलाएं, बच्चे और हुसैन का बेटा जैन उल अबीदिन याजिद की सेना द्वारा कैद कर लिए गए थे और कुफा के गवर्नर की अदालत में पेश किए जाने थे.

कुफा वो शहर था जहां जैनब और उनकी बहन उम्मे कुलसुम ने महिलाओं को कुरान के पाठ पढ़ाए थे. पैगंबर की नवासी जैनब अपने पिता अली और भाई बहन के साथ इसी शहर में रही थीं.

इसी शहर में बंदी बनाकर जैनब को लाया गया. जैसे ही कारवां कुफा में पहुंचा वहां लोगों की भीड़ लग गई उन लोगों को देखने के लिए जिन्हें सत्ता ने गद्दार साबित कर दिया था. कहा जाता है कि जिनकी मौत हुई थी कर्बला के युद्ध में उनका सिर लाने को कहा गया था और उस समय हुसैन और हसन का सिर लिए जैनब चली आ रही थीं. उन्होंने उसी समय जैनब ने अपना पहला उपदेश दिया.

उसी समय जैनब ने अपना पहला उपदेश दिया. जब लोग उन्हें गद्दार समझ रहे थे. लोगों की आवाज में जैनब की आवाज दब गई और जैनब ने जोर से चिल्ला कर लोगों के बीच अपनी बात पहुंचाई. वो उसी तरह से बोल रही थीं जैसे उनके पिता इमाम अली बोलते थे.

मुहर्रम का शोक

मोहर्रम के महीने में इस्लाम धर्म के संस्थापक हजरत मुहम्मद साहब के छोटे नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 अनुयाइयों का कत्ल कर दिया गया था. हजरत हुसैन इराक के शहर करबला में यजीद की फौज से लड़ते हुए शहीद हुए थे.

शिया मातम क्यों करते है

इस्लामिक कैलेंडर के पहले महीने को मुहर्रम कहते हैं. इस महीने से इस्लाम का नया साल शुरु हो जाता है. इस गम का महीना भी कहा जाता है. इस महीने मुस्लिम खुशियां नहीं मनाते हैं. बल्कि मातम मनाया जाता है. पूरे महीने का सबसे अहम दिन होता है 10वां मुहर्रम.

इतिहास के मुताबिक 1400 साल पहले तारीख ए इस्लाम में कर्बला की जंग हुई थी. ये जंग जुल्म के खिलाफ इंसाफ के लिए लड़ी गई थी. इस जंग में पैंगबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन और उनके 72 साथियों को शहीद कर दिया गया था.

मुआविया नाम के शासक के निधन के बाद उसकी विरासत उनके बेटे यजीद को मिली. यजीद इस्लाम को अपने तरीके से चलाना चाहता था. यजीद ने पैगंबर मोहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को अपने मुताबिक चलते को कहा और खुद को उनके खलीफे के रूप में स्वीकार करने का आदेश दिया.

कुरान और प्रोफेट मोहम्मद में शिया और सुन्नी दोनों ही विश्वास रखते हैं. दोनों ही इस्लाम की अधिकतर बातों पर सहमत रहते हैं. दोनों में फर्क इतिहास, विचारधारा और लीडरशिप से जुड़ा हुआ है. इसकी झगड़े की शुरूआत हुई 632 ईस्वी में पैगंबर मोहम्मद की मौत के बाद. मामला ये था कि पैंगबर की अनुपस्थिति में उनका खलीफा कौन होगा.

जहां एक ओर अधिकत्तर लोग पैंगबर के करीबी अबु बकर की तरफ थे, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने हजरत मोहम्मद के दामाद अली को खलीफ बनाने की पैरवी की. उनका कहना था कि पैंगबर ने अली को मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक और धार्मिक लीडर के तौर पर चुना था. जिन लोगों ने अबु बकर में अपना भरोसा दिखाया, वह सुन्नी कहलाए. यह लोग पैंगबर मोहम्मद की परंपरा और विचारधारा को मानते हैं. वहीं दूसरी ओर, जिन लोगों ने अली में भरोसा किया वह शिया कहलाएं.

अबु बकर पहले खलीफा बने और चौथे खलीफा बने. हालांकि, अली की लीडरशिप को पैंगबर की पत्नी और अबु बकर की बेटी आयशा ने चुनौती दी. इसके बाद इराक के बसरा में 656 ईस्वी में अली और आयशा के बीच युद्ध हुआ. आयशा उस युद्ध में हार गई और शिया-सुन्नी के बीच की खाई और भी गहरी हो गई. इसके बाद दमिश्क के मुस्लिम गवर्नर मुआविया ने भी अली के खिलाफ जंग छेड़ दी, जिसने दोनों के बीच दूरियां और भी अधिक बढ़ा दीं.

आने वाले कुछ सालों ने मुआविया खलीफा बन गए और उन्होंने उम्याद वंश की स्थापना की. इसके बाद अली और पैंगबर मोहम्मद की बेटी फातिमा के बेटे यानी पैगंबर के नवासे हुसैन ने इसाक के कुफा में मुआविा के बेटे यजीद के खिलाफ जंग छेड़ दी.

शिया मुस्लिम इसे कर्बला की जंग कहते हैं, जो धार्मिक रूप से बहुत बड़ी अहमियत रखता है. इस जंग में हुसैन की हत्या कर दी गई और उनकी सेना हार गई. शिया समुदाय के लिए हुसैन एक शहीद बन गए.

जहां एक ओर अधिकत्तर लोग पैंगबर के करीबी अबु बकर की तरफ थे, वहीं दूसरी ओर कुछ लोगों ने हजरत मोहम्मद के दामाद अली को खलीफा बनाने की पैरवी की. उनका कहना था कि पैगंबर ने अली को मुस्लिम समुदाय के राजनीतिक और धार्मिक लीडर तौर पर चुना था. जिन लोगों ने अबु बकर में अपना भरोसा दिखाया. वो सुन्नी कहलाएं. यह लोग पैंगबर मोहम्मद की परंपरा और विचारधारा को मानते हैं. वहीं दूसरी ओर, जिन लोगों ने अली में भरोसा किया वह शिया कहलाए.

सुन्नी मुस्लिम वक्त के साथ-साथ इस्लाम बढ़ता गया. शिया और सुन्नी मुस्लिमों ने अलग अलग विचारधारा अपना ली. सुन्नी मुस्लिमों ने सेक्युलर लीडरशिप चुनी. उन्होंने उम्माद के दौरान के खलीफाओं की सेक्युलर लीडरशिप पर भरोसा किया.

सुन्नी मुस्लिमों को सातवीं और आठवीं शताब्दी में शुरू हुए 4 इस्लामिक स्कूलों से हर बात पर निर्देश मिलते हैं. न सिर्फ धार्मिक, बल्कि कानून, परिवार, बैंकिंग फाइनेंस यहां तक कि पर्यावरण से जुड़ी बातों पर भी सुन्नी मुस्लिम इन्हीं स्कूलों से मदद लेकर फैसला लेते हैं. आज के समय में दुनिया भर में मुस्लिम आबादी का 80-90 फीसदी हिस्सा सुन्नी है. इस इतिहास के चलते शिया मुहर्रम मनाते हैं.

महिलाएं मुहर्रम कैसे और कब मनाती हैं

मुहर्रम इस्लामिक वर्ष का पहला महीना होता है. ये पर्व इस महीने की 10वीं तारीख को मनाया जाता है. इस त्योहार को मनाने की वजह इस्लाम धर्म के प्रवर्तक पैगंबर हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन की शहादत के गम में मनाया जाता है. 

मोहर्रम की पहली तारीख से ही मजलिसें शुरू हो जाती हैं. ज्यादा जगहों पर ताजिया भी रख दिए जाते हैं. दस तारीख को लगभग तीन हजार ताजियों के साथ जुलूस निकलता है. जो न्यू आगरा व सराय ख्वाजा और गोबर चौकी की कर्बला में पहुंचता है. यहां पर ताजियों को दफन किया जाता है. 12 तारीख को तीज पर मातम का जुलूस निकलता है. इस दिन महिलाएं मुहर्रम का चांद देखकर चूड़ियां तोड़ती हैं. ऐसा करके वो हुसैन साहब की शहादत को याद करती हैं.

ताजिया कब है 2020

मोहर्रम की पहली तारीख से ही मजलिसें शुरू हो जाती हैं. ज्यादा जगहों पर ताजिया भी रख दिए जाते हैं. दस तारीख को लगभग तीन हजार ताजियों के साथ जुलूस निकलता है. जो न्यू आगरा व सराय ख्वाजा और गोबर चौकी की कर्बला में पहुंचता है. यहां पर ताजियों को दफन किया जाता है. 12 तारीख को तीज पर मातम का जुलूस निकलता है. सरकार की गाइडलाइन के अनुसार इस बार ताजिया और चौकी नहीं रखी जाएगी. फातिहा का कार्यक्रम करने के बाद इमामबाड़ा बंद कर दिया जाएगा.

मुहर्रम के तरीके

मुहर्रम खुशियों का नहीं बल्कि मातम मनाने का त्योहार है. क्योंकि मुहर्रम महीने के दसवें दिन इमाम हुसैन अली अपने 72 साथियों के साथ कर्बला के मैदान में शहीद हुए थे. इस गम के त्योहार को मुस्लिम समुदाय के दो वर्ग शिया और सुन्नी अलग अलग तरीके से मनाते हैं.

शिया समुदाय के लोग हुसैन अली को खलीफा और अपने करीब मानते हैं. शिया समुदाय के लोग पहले मुहर्रम से 10वें मुहर्रम यानी अशुरा के दिन तक मातम मनाते हैं. इस दौरान शिया समुदाय के लोग रंगीन कपड़े और श्रृंगार से दूर रहते हैं. मुहर्रम के दिन यह अपना खून बहाकर हुसैन की शहादत का गम मनाते हैं. यह आपस में तलवार और लाठी से कर्बला की जंग की प्रतीकात्मक लड़ाई लड़ते हैं.

मोहर्रम के महीने मे सवारी क्यूं बढ़ते है 12वीं शताब्दी में गुलाम वंश के पहले शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के समय से ही दिल्ली में इस मौके पर ताजिये (मोहर्रम का जुलूस) निकाले जाते रहे हैं.

जिनके बाद जिस भी सुल्तान ने भारत में राज किया,उन्होंने ताजिये की परंपरा को चलने दिया. हालांकि वो मुख्य रूप से सुन्नी थे, शिया नहीं थे.

पैगंबर इस्लाम हजरत मोहम्मद के नाती हजरत इमाम हुसैन को इसी मोहर्रम के महीने में ककर्बला की जंग (680 ईसवी) में परिवार और दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था.

हज़रत इमाम हुसैन का मक़बरा इराक़ के शहर कर्बला में उसी जगह है जहां ये जंग हुई थी. ये जगह इराक़ की राजधानी बग़दाद से क़रीब 120 किलोमीटर दूर है और बेहद सम्मानित स्थान है.

Muharram 2020

ये पर्व चांद नजर आने के साथ ही 21 या 22 अगस्त से शुरू होगा. इस शिया मुस्लिम समुदाय के लोग गम के रूप में मनाते हैं. इस दिन इमाम हुसैन और उनके अनुयायियों की शहादत को याद किया जाता है.

सारांश

मैं आशा करती हूं  मोहर्रम का आपको मेरा ये लेख ‘पसंद आया होगा. मेरी यही कोशिश है कि मैं रिडर्स को इसके बारे में पूरी जानकारी दूं. जिससे आपको इससे जुड़ी अन्य जानकारी के लिए इंटरनेट पर कहीं और खोजने की जरूरत ना पड़े. अगर आपको ये आर्टिकल पसंद आया हो तो आप इसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर शेयर कर सकते हैं.

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