Mokshagundam Visvesvaraya Biography - मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या की जीवनी

Mokshagundam Visvesvaraya Biography – मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या की जीवनी

जीवनी

‘मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या की जीवनी (Mokshagundam Visvesvaraya Biography)’ हमें काफी प्रभावित करती है। ईंट, पत्थर, लोहे और सीमेंट की इमारत बनाने वाला कोई इंजीनियर एक शिल्पकार ही माना जाता है। पर, उसकी इंजीनियरिंग में विशिष्ट तकनीकी कौशल के साथ-साथ सामाजिक सरोकार भी जुड़ जाएं तो वह महान बन जाता है। गुलामी के दौर में अपनी प्रतिभा से भारत के विकास में योगदान देने वाले सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया एक ऐसे ही युगद्रष्टा इंजीनियर थे। बहुत कम लोगों को पता होगा कि हर साल 15 सितंबर को उनकी याद में ही इंजीनियर दिवस मनाया जाता है।

भारत के माने हुए सफल इंजीनियर Mokshagundam Visvesvaraya का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुका में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया को भारत की प्रौद्योगिकी का जनक कहा जाता है। वे ईमानदारी, त्याग, मेहनत जैसे सद्गुणों से संपन्न थे। उनका कहना था, कार्य जो भी हो लेकिन वह इस ढंग से किया गया हो कि वह दूसरों के कार्य से श्रेष्ठ हो। विश्वेश्वरैया ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि इंजीनियरिंग की पढ़ाई के दौरान उन्हें कितनी कठिन परिस्थितियों सो गुजरना पड़ा परंतु वह कभी निराश नहीं हुए।

अपनी आत्मकथा में उन सिद्धांतों पर प्रकाश डाला है, जिनका अनुपालन कर वे प्रगति के पथ पर अग्रसर हो सके। इस पुस्तक का नाम है ‘मेमॉयर्स ऑफ माई वर्किंग लाइफ।’

इस पुस्तक में वे लिखते हैं- ‘मैंने चार सिद्धांतों को आदि से अंत तक अपनाए रखा। जो मेरी ही तरह सफल और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीना चाहते है, उन्हें उन सिद्धांतों का स्मरण दिलाना चाहता हूं और उनसे अनुरोध करता हूं कि मेरी ही तरह अन्य लोग भी उसे अपनाने का प्रयास करें।

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जानकारी एक नज़र में

पूरा नाम‘मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या
धर्म –हिन्दू
जन्म –15 सितम्बर 1860
जन्म स्थानमैसूरकर्नाटक
मातासिताम्मा
पिता –वेंकाचम्मा
उपलब्धियाँ1955, ‘भारत रत्न’ से सम्मानित
मातृ संस्था – ·       सेंट्रल कॉलेजबैंगलोर
·       मद्रास विश्वविद्यालय (University of Madras)
·       कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंगपुणे
·       बंबई विश्वविद्यालय (University of Bombay)
मृत्यु14 अप्रैल, 1962
मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जानकारी एक नज़र में

Mokshagundam Visvesvaraya की जीवनी

विश्वेश्वरय्या 100 वर्षों से अधिक जीवित रहे थे और अंत तक सक्रिय जीवन ही व्यतीत किया था। उनसे जुड़ा एक किस्सा काफी मशहूर है कि एक बार एक व्यक्ति ने उनसे पूछा, ‘आपके चिर यौवन (दीर्घायु) का रहस्य क्या है?’ तब डॉ. विश्वेश्वरय्या ने उत्तर दिया, ‘जब बुढ़ापा मेरा दरवाज़ा खटखटाता है तो मैं भीतर से जवाब देता हूं कि विश्वेश्वरय्या घर पर नहीं है और वह निराश होकर लौट जाता है। बुढ़ापे से मेरी मुलाकात ही नहीं हो पाती तो वह मुझ पर हावी कैसे हो सकता है?’ 

अंग्रेजों को लेकर भी Mokshagundam Visvesvaraya जुड़ा एक किस्सा काफी प्रसिद्ध है।

दरअसल, यह उस समय की बात है जब भारत में अंग्रेजों का शासन था। खचाखच भरी एक रेलगाड़ी चली जा रही थी। यात्रियों में अधिकतर अंग्रेज थे। एक डिब्बे में एक भारतीय मुसाफिर गंभीर मुद्रा में बैठा था। सांवले रंग और मंझले कद का वह यात्री साधारण वेशभूषा में था इसलिए वहां बैठे अंग्रेज उसे मूर्ख और अनपढ़ समझ रहे थे और उसका मजाक उड़ा रहे थे। पर वह व्यक्ति किसी की बात पर ध्यान नहीं दे रहा था। 

अचानक उस व्यक्ति ने उठकर ट्रेन की जंजीर खींच दी। तेज रफ्तार में दौड़ती ट्रेन तत्काल रुक गई। सभी यात्री उसे भला-बुरा कहने लगे। थोड़ी देर में गार्ड भी आ गया और उसने पूछा, ‘जंजीर किसने खींची है?’ उस व्यक्ति ने बेझिझक उत्तर दिया, ‘मैंने खींची है।’ कारण पूछने पर उसने बताया, ‘मेरा अनुमान है कि यहां से लगभग एक फर्लांग (220 गज) की दूरी पर रेल की पटरी उखड़ी हुई है।’ 

गार्ड ने पूछा, ‘आपको कैसे पता चला?’ वह बोला, ‘श्रीमान! मैंने अनुभव किया कि गाड़ी की स्वाभाविक गति में अंतर आ गया है। पटरी से गूंजने वाली आवाज की गति से मुझे खतरे का आभास हो रहा है।’ गार्ड उस व्यक्ति को साथ लेकर जब कुछ दूरी पर पहुंचा तो यह देखकर दंग रह गया कि वास्तव में एक जगह से रेल की पटरी के जोड़ खुले हुए हैं और सब नट-बोल्ट अलग बिखरे पड़े हैं। तब तक दूसरे यात्री भी वहां आ पहुंचे। 

जब लोगों को पता चला कि उस व्यक्ति की सूझबूझ के कारण उनकी जान बच गई है तो वे उसकी प्रशंसा करने लगे। गार्ड ने पूछा, ‘आप कौन हैं?’ उस व्यक्ति ने कहा, ‘मैं एक इंजीनियर हूं और मेरा नाम है डॉ. एम. विश्वेश्वरैया है।’ यह नाम सुन ट्रेन में बैठे सारे अंग्रेज स्तब्ध रह गए। 

दरअसल उस समय तक देश में डॉ. विश्वेश्वरय्या की ख्याति फैल चुकी थी। ट्रेन में बैठे सारे लोग उनसे माफी मांगने लगे। तब Dr. Mokshagundam Visvesvaraya ने उत्तर दिया, ‘आप सब ने मुझे जो कुछ भी कहा होगा, मुझे तो बिल्कुल याद नहीं है।’ 

विश्वेश्वरय्या का शुरूआती जीवन परिचय – Early Life of Mokshagundam Visvesvaraya

विश्वेश्वरय्या का जन्म मैसूर (कर्नाटक) के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1861 को एक तेलुगु परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम श्रीनिवास शास्त्री तथा माता का नाम वेंकाचम्मा था। पिता संस्कृत के विद्वान थे। विश्वेश्वरैया ने प्रारंभिक शिक्षा जन्मस्थान से ही पूरी की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने बंगलूर के सेंट्रल कॉलेज में प्रवेश लिया। लेकिन यहां उनके पास धन का अभाव था। अत: उन्हें टयूशन करना पड़ा। विश्वेश्वरैया ने 1881 में बीए की परीक्षा में अव्वल स्थान प्राप्त किया। इसके बाद मैसूर सरकार की मदद से इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए पूना के साइंस कॉलेज में दाखिला लिया। 1883 की एलसीई व एफसीई (वर्तमान समय की बीई उपाधि) की परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपनी योग्यता का परिचय दिया। इसी उपलब्धि के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इन्हें नासिक में सहायक इंजीनियर के पद पर नियुक्त किया।

Mokshagundam Visvesvaraya का कैरियर

इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद उन्हें मुंबई के PWD विभाग में नौकरी मिल गयी। उन्होंने डेक्कन में एक जटिल सिंचाई व्यवस्था को कार्यान्वित किया। संसाधनों और उच्च तकनीक के अभाव में भी उन्होंने कई परियोजनाओं को सफल बनाया। इनमें प्रमुख थे कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय और बैंक ऑफ मैसूर। ये उपलब्धियां एमवी के कठिन प्रयास से ही संभव हो पाई।

मात्र 32 साल के उम्र में सुक्कुर (सिंध) महापालिका के लिए कार्य करते हुए उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को जल आपूर्ति की जो योजना उन्होंने तैयार किया वो सभी इंजीनियरों को पसंद आया।

अंग्रेज सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए एक समिति बनाई। उनको इस समिति का सदस्य बनाया गया। इसके लिए उन्होंने एक नए ब्लॉक प्रणाली का आविष्कार किया। इसके अंतर्गत उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस प्रणाली की बहुत तारीफ़ हुई और आज भी यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है।

उन्होंने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी योजना बनायीं थी। इसके बाद उन्हें वर्ष 1909 में मैसूर राज्य का मुख्य अभियन्ता नियुक्त किया गया।

वो मैसूर राज्य में आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे। इन समस्याओं से निपटने के लिए उन्होंने ने ‘इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस’ के गठन का सुझाव दिया। इसके बाद उन्होंने मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया। चूँकि इस समय देश में सीमेंट नहीं बनता था इसलिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था।

विश्वेश्वरय्या के असाधारण कार्य

उनके इंजीनियरिंग के असाधारण कार्यों में मैसूर शहर में कन्नमबाडी या कृष्णराज सागर बांध बनाना एक महत्त्वपूर्ण कार्य था। उसकी योजना सन् 1909 में बनाई गई थी और सन् 1932 में यह पूरा हुआ। बम्बई प्रेसीडेन्सी में कई जलाशय बनाने के बाद, सिंचाई व विद्युत शक्ति के लिए उन्होंने कावेरी नदी को काम में लाने के लिए योजना बनाई। विशेषकर कोलार स्वर्ण खदानों के लिए दोनों ही महत्त्वपूर्ण थे। बांध 124 फुट ऊँचा था, जिसमें 48,000 मिलियन घन फुट पानी का संचय किया जा सकता था। जिसका उपयोग 150,000 एकड़ भूमि की सिंचाई और 60,000 किलो वाट्स ऊर्जा उत्पन्न करने के लिए होना था। तब तक कृष्णराज सागर बांध भारत में बना सबसे बड़ा जलाशय था। इस बहुउद्देशीय परियोजना के कारण अनेक उद्योग विकसित हुए, जिसमें भारत की विशालतम चीनी मिल, मैसूर चीनी मिल भी शामिल है। अपनी दूरदृष्टि के कारण, विश्वेश्वरैया ने परिस्थिति विज्ञान के पहलू पर भी पूरा ध्यान दिया। मैसूर शहर में आने वाला प्रत्येक यात्री कृष्णराज सागर बांध और उसके पास ही स्थित प्रसिद्ध वृन्दावन गार्डन देखना एक आवश्यक कार्य मानता था। वहाँ फव्वारों का जल प्रपात, मर्मर पक्षी और आकर्षक फूलों की बहुतायत देखते ही बनती थी।

विश्वेश्वरय्या के जीवन का एक रोचक किस्सा

एक बार कुछ भारतीयों को अमेरिका में कुछ फैक्टरियों की कार्यप्रणाली देखने के लिए भेजा गया। फैक्टरी के एक ऑफीसर ने एक विशेष मशीन की तरफ इशारा करते हुए कहा, “अगर आप इस मशीन के बारे में जानना चाहते हैं, तो आपको इसे 75 फुट ऊंची सीढ़ी पर चढ़कर देखना होगा”। भारतीयों का प्रतिनिधित्व कर रहे सबसे उम्रदराज व्यक्ति ने कहा, “ठीक है, हम अभी चढ़ते हैं”। यह कहकर वह व्यक्ति तेजी से सीढ़ी पर चढ़ने के लिए आगे बढ़ा। ज्यादातर लोग सीढ़ी की ऊंचाई से डर कर पीछे हट गए तथा कुछ उस व्यक्ति के साथ हो लिए। शीघ्र ही मशीन का निरीक्षण करने के बाद वह शख्स नीचे उतर आया। केवल तीन अन्य लोगों ने ही उस कार्य को अंजाम दिया। यह व्यक्ति कोई और नहीं बल्कि Mokshagundam Visvesvaraya थे जो कि सर एमवी के नाम से भी विख्यात थे।

विश्वेश्वरय्या के महत्वपूर्ण कार्य

दक्षिण भारत के मैसूर, कर्र्नाटक को एक विकसित एवं समृद्धशाली क्षेत्र बनाने में एमवी का अभूतपूर्व योगदान है। तकरीबन 55 वर्ष पहले जब देश स्वंतत्र नहीं था, तब कृष्णराजसागर बांध, भद्रावती आयरन एंड स्टील व‌र्क्स, मैसूर संदल ऑयल एंड सोप फैक्टरी, मैसूर विश्वविद्यालय, बैंक ऑफ मैसूर समेत अन्य कई महान उपलब्धियां एमवी ने कड़े प्रयास से ही संभव हो पाई। इसीलिए इन्हें कर्नाटक का भगीरथ भी कहते हैं। जब वह केवल 32 वर्ष के थे, उन्होंने सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की पूर्ति भेजने का प्लान तैयार किया जो सभी इंजीनियरों को पसंद आया। सरकार ने सिंचाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के उपायों को ढूंढने के लिए समिति बनाई। इसके लिए एमवी ने एक नए ब्लॉक सिस्टम को ईजाद किया। उन्होंने स्टील के दरवाजे बनाए जो कि बांध से पानी के बहाव को रोकने में मदद करता था। उनके इस सिस्टम की प्रशंसा ब्रिटिश अधिकारियों ने मुक्तकंठ से की। आज यह प्रणाली पूरे विश्व में प्रयोग में लाई जा रही है। विश्वेश्वरैया ने मूसा व इसा नामक दो नदियों के पानी को बांधने के लिए भी प्लान तैयार किए। इसके बाद उन्हें मैसूर का चीफ इंजीनियर नियुक्त किया गया।

उस समय राज्य की हालत काफी बदतर थी। विश्वेश्वरैया लोगों की आधारभूत समस्याओं जैसे अशिक्षा, गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी आदि को लेकर भी चिंतित थे। फैक्टरियों का अभाव, सिंचाई के लिए वर्षा जल पर निर्भरता तथा खेती के पारंपरिक साधनों के प्रयोग के कारण समस्याएं जस की तस थीं। इन समस्याओं के समाधान के लिए विश्वेश्वरैया ने इकॉनोमिक कॉन्फ्रेंस के गठन का सुझाव दिया। मैसूर के कृष्ण राजसागर बांध का निर्माण कराया। कृष्णराजसागर बांध के निर्माण के दौरान देश में सीमेंट नहीं बनता था, इसके लिए इंजीनियरों ने मोर्टार तैयार किया जो सीमेंट से ज्यादा मजबूत था। 1912 में विश्वेश्वरय्या को मैसूर के महाराजा ने दीवान यानी मुख्यमंत्री नियुक्त कर दिया।

विश्वेश्वरय्या शिक्षा की महत्त्व को भलीभांति समझते थे। लोगों की गरीबी व कठिनाइयों का मुख्य कारण वह अशिक्षा को मानते थे। उन्होंने अपने कार्यकाल में मैसूर राज्य में स्कूलों की संख्या को 4,500 से बढ़ाकर 10,500 कर दिया। इसके साथ ही विद्यार्थियों की संख्या भी 1,40,000 से 3,66,000 तक पहुंच गई। मैसूर में लड़कियों के लिए अलग हॉस्टल तथा पहला फ‌र्स्ट ग्रेड कॉलेज (महारानी कॉलेज) खुलवाने का श्रेय भी विश्वेश्वरय्या को ही जाता है। उन दिनों मैसूर के सभी कॉलेज मद्रास विश्वविद्यालय से संबद्ध थे। उनके ही अथक प्रयासों के चलते मैसूर विश्वविद्यालय की स्थापना हुई जो देश के सबसे पुराने विश्वविद्यालयों में से एक है। इसके अलावा उन्होंने श्रेष्ठ छात्रों को अध्ययन करने के लिए विदेश जाने हेतु छात्रवृत्ति की भी व्यवस्था की। उन्होंने कई कृषि, इंजीनियरिंग व औद्योगिक कालेजों को भी खुलवाया।

वह उद्योग को देश की जान मानते थे, इसीलिए उन्होंने पहले से मौजूद उद्योगों जैसे सिल्क, संदल, मेटल, स्टील आदि को जापान व इटली के विशेषज्ञों की मदद से और अधिक विकसित किया। धन की जरूरत को पूरा करने के लिए उन्होंने बैंक ऑफ मैसूर खुलवाया। इस धन का उपयोग उद्योग-धंधों को विकसित करने में किया जाने लगा। 1918 में विश्वेश्वरय्या दीवान पद से सेवानिवृत्त हो गए। औरों से अलग विश्वेश्वरैया ने 44 वर्ष तक और सक्रिय रहकर देश की सेवा की। सेवानिवृत्ति के दस वर्ष बाद भद्रा नदी में बाढ़ आ जाने से भद्रावती स्टील फैक्ट्री बंद हो गई। फैक्ट्री के जनरल मैनेजर जो एक अमेरिकन थे, ने स्थिति बहाल होने में छह महीने का वक्त मांगा। जोकि विश्वेश्वरय्या को बहुत अधिक लगा। उन्होंने उस व्यक्ति को तुरंत हटाकर भारतीय इंजीनियरों को प्रशिक्षित कर तमाम विदेशी इंजीनियरों की जगह नियुक्त कर दिया। मैसूर में ऑटोमोबाइल तथा एयरक्राफ्ट फैक्टरी की शुरूआत करने का सपना मन में संजोए विश्वेश्वरय्या ने 1935 में इस दिशा में कार्य शुरू किया। बंगलूर स्थित हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स तथा मुंबई की प्रीमियर ऑटोमोबाइल फैक्टरी उन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। 1947 में वह आल इंडिया मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष बने। उड़ीसा की नदियों की बाढ़ की समस्या से निजात पाने के लिए उन्होंने एक रिपोर्ट पेश की। इसी रिपोर्ट के आधार पर हीराकुंड तथा अन्य कई बांधों का निर्माण हुआ।

वह किसी भी कार्य को योजनाबद्ध तरीके से पूरा करने में विश्वास करते थे। 1928 में पहली बार रूस ने इस बात की महत्ता को समझते हुए प्रथम पंचवर्षीय योजना तैयार की थी। लेकिन विश्वेश्वरैया ने आठ वर्ष पहले ही 1920 में अपनी किताब रिकंस्ट्रक्टिंग इंडिया में इस तथ्य पर जोर दिया था। इसके अलावा 1935 में प्लान्ड इकॉनामी फॉर इंडिया भी लिखी। मजे की बात यह है कि 98 वर्ष की उम्र में भी वह प्लानिंग पर एक किताब लिख रहे थे। देश की सेवा ही विश्वेश्वरैया की तपस्या थी। 1955 में उनकी अभूतपूर्व तथा जनहितकारी उपलब्धियों के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया। जब वह 100 वर्ष के हुए तो भारत सरकार ने डाक टिकट जारी कर उनके सम्मान को और बढ़ाया। 101 वर्ष की दीर्घायु में 14 अप्रैल 1962 को उनका स्वर्गवास हो गया।

1952 में वह पटना गंगा नदी पर राजेन्द्र सेतु पुल निर्माण की योजना के संबंध में गए। उस समय उनकी आयु 92 थी। तपती धूप थी और साइट पर कार से जाना संभव नहीं था। इसके बावजूद वह साइट पर पैदल ही गए और लोगों को हैरत में डाल दिया। Mokshagundam Visvesvaraya ईमानदारी, त्याग, मेहनत इत्यादि जैसे सद्गुणों से संपन्न थे। उनका कहना था, कार्य जो भी हो लेकिन वह इस ढंग से किया गया हो कि वह दूसरों के कार्य से श्रेष्ठ हो।

विश्वेश्वरय्या की मृत्यु कब हुई – Death of Mokshagundam Visvesvaraya

101 की उम्र में 14 अप्रैल 1962 को विश्वेश्वरय्या का निधन हो गया।

Mokshagundam Visvesvaraya की उपलब्धियाँ – Awards

सन 1909 में विश्‍वेश्‍वरैया के चीफ इंजीनियर बनने के तीन साल बाद ही मैसूर राज्‍य के तत्‍कालीन दीवान (प्रधानमंत्री) की मृत्‍यु हो गयी। मैसूर के महाराजा उस समय तक डॉ. विश्वेश्वरय्या के गुणों से भलीभाँति परिचित हो चुके थे। इसलिए उन्‍होंने विश्‍वेश्‍वरैया को मैसूर का नया दीवान नियुक्‍त कर दिया। इस पद पर विश्‍वेश्‍वरैया लगभग 6 वर्ष तक रहे। दीवान बनने के साथ ही विश्वेश्वरय्या ने राज्‍य के समग्र विकास पर ध्‍यान देना शुरू किया। उन्‍होंने अपने कार्यकाल में शिक्षा के प्रचार-प्रसार पर बल दिया और प्रदेश में अनके तकनीकी संस्‍थानों की नींव रखी।

विश्वेश्वरय्या ने 1913 में स्‍टेट बैंक ऑफ मैसूर की स्‍थापना की। व्‍यापार तक जनपरिवहन को सुचारू बनाने के लिए उन्‍होंने राज्‍य में अनेक महत्‍वपूर्ण स्‍थानों पर रेलवे लाइन बनवाईं। इसके साथ ही साथ उन्‍होंने इंजीनियरिंग कॉलेज, बंगलौर (1916) एवं मैसूर विश्वविद्यालय की स्‍थापना की।सन 1918 में ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्‍होंने पॉवर स्टेशन की भी स्‍थापना की। इसके साथ ही साथ उन्‍होंने सामाजिक विकास के लिए अनेक योजनाओं को संचालित किया, प्रेस की स्‍वतंत्रता को लागू करवाया और औद्योगीकरण पर बल दिया।

सम्मान और पुरस्कार

  • 1904: लगातार 50 साल तक लन्दन इंस्टिट्यूट ऑफ़ सिविल इंजीनियर्स की मानद सदस्यता
  • 1906: उनकी सेवाओं की मान्यता में “केसर-ए-हिंद ‘ की उपाधि
  • 1911: कम्पैनियन ऑफ़ द इंडियन एम्पायर (CIE)
  • 1915: नाइट कमांडर ऑफ़ द आर्डर ऑफ़ थे इंडियन एम्पायर (KCIE )
  • 1921: कलकत्ता विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ़ साइंस से सम्मानित
  • 1931: बॉम्बे विश्वविद्यालय द्वारा LLD
  • 1937: बनारस हिंदू विश्वविद्यालय द्वारा D. Litt से सम्मानित
  • 1943: इंस्टीट्यूशन ऑफ इंजीनियर्स (भारत) के आजीवन मानद सदस्य निर्वाचित
  • 1944: इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा D.Sc.
  • 1948: मैसूर विश्वविद्यालय ने डॉक्टरेट – LLD से नवाज़ा
  • 1953: आंध्र विश्वविद्यालय द्वारा D.Litt से सम्मानित
  • 1953: इंस्टिट्यूट ऑफ़ टाउन प्लानर्स ( भारत) के मानद फैलोशिप से सम्मानित
  • 1955: ‘भारत रत्न’ से सम्मानित
  • 1958: बंगाल की रॉयल एशियाटिक सोसायटी परिषद द्वारा ‘दुर्गा प्रसाद खेतान मेमोरियल गोल्ड मेडल’
  • 1959: इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ साइंस द्वारा फैलोशिप

M. Visvesvaraya से जुड़ी ये किताबें बदल सकती हैं आपका जीवन

Sir M Vishweshwaraiah Books

मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया या एम विश्वेश्वरैया को आधुनिक भारत का इंजिनियर कहा जाता है। इनका जन्म 15 सितंबर 1861 में मैसूर में हुआ था। मैसूर में बने कृष्ण राजा सागर डैम को बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। एम विश्वेश्वरैया हैदराबाद में बाढ़ बचाव के चीफ इंजिनियर थे। इनके जीवन पर कई किताबें लिखी गई हैं जिनसे काफी कुछ सीखने को मिलता है। कर्नाटक राज्य से संबंध होने के कारण इनसे जुडी अधिकतर किताबें कन्नड भाषा में लिखी गई है लेकिन कई किताबें हिंदी और इंगलिश में भी हैं।

Vishweshwaraiah

यह किताब आपको ऑनलाइन आसानी से मिल जाएगी। हिंदी में इस किताब का नाम महान इंजिनियर विश्वेश्वरैया है। इस किताब को कुमार दिनकर ने लिखा है। किताब ज्यादा महंगी भी नहीं है। इस किताब की कीमत करीब 175 रुपए है। यह हिंदी में लिखी गई किताब है और इसे प्रभात प्रकाशन ने पब्लिश किया है। इस किताब में कुल 136 पेज है।

Sir M. Vishweshwaraiah: Jeevana Charithre

अगर आप एम विश्वेश्वरैया के जीवन के करीब से जानना चाहते हैं तो आपको यह किताब जरूर पढ़नी चाहिए। इस किताब में उनके जीवन को गहराई से बताया गया है। हालांकि यह किताब कन्नड भाषा में लिखी गई है इस किताब में कुल 220 पेज हैं और इसकी कीमत 550 रुपए है। इस किताब के अभी तक दो एडीशन आ चुके हैं। अगर आपको कन्नड भाषा आती है तो यह एम विश्वेश्वरैया के जीवन के बारे में जानने की बेहतरीन किताब है।

Sir Vishweshwaraya

यह किताब पेपर और किंडल दोनो एडीशन में उपलब्ध हैं किताब की कीमत केवल 148 रुपए है यह किताब 2017 में लिखी गई थी। यह मराठी भाषा में लिखी गई किताब है। किताब को ऑनलाइन मंगाया जा सकता है। इस किताब के लेखक मुकुंद धारशिवकर हैं।

एम विश्वेश्वरैया लिखी यह किताब भी कन्नड भाषा में उपलब्ध है। यह किताब ऑनलाइन खरीदी जा सकती है। इस किताब की कीमत करीब 120 रुपए और इसे टी आर अनंथ रामू ने लिखा है। इसे नवकर्नाटका प्रकाशन ने प्रकाशित किया है। किताब में एम विश्वेश्वरैया निजी और सार्वजनिक जीवन के बारे में बताया गया है।

सारांश

मुझे आशा है कि आपको मेरा यह लेख “सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरय्या की जीवनी – Mokshagundam Visvesvaraya Biography” बहुत पसंद आया होगा और आपको यह उपयोगी और प्रेरक लगा होगा. मेरी यही कोशिश है कि मैं अपने रिडर्स को इसके बारे में पूरी जानकारी दूं जिससे सम्बंधित विषय से आपको जानकारी के लिए कहीं और खोजना न पड़े और आपका समय और मेहनत दोनों बचे। यदि आपको यह लेख पसंद आया हो तो इसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर सकते हैं.और हाँ अगर कोई टॉपिक छूट गया हो या फिर आपका कोई सुझाव हो तो आप कमेंट बॉक्स में लिख सकते हैं। हम उस पर अमल करने की पूरी कोशिश करेंगे। यदि आपको यह लेख पसंद आया हो तो इसे अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक और व्हाट्सएप पर शेयर कर सकते हैं.

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